रविवार, 16 दिसंबर 2012

माँ ... तेरे जाने के बाद ...


सब कह रहे हैं 
तू इस लोक से 
परलोक की यात्रा पर अग्रसर है 

कर्म-कांड भी इस निमित्त हो रहे हैं   

पिंड से पिंड का मिलान 
साल भर रौशनी के लिए दीपक 
तीन सो पैंसठ नीम के दातुन 
और भी क्या क्या ...  

भवसागर सहजता से पार हो 
ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं सब 

पर तू तो बैठी है कोने में माँ   
शांत, चुप-चाप, टकटकी लगाये  

समझ सकता हूं 
तेरी उदासी का कारण 

कदम कदम पे तुझसे 
पूछ पूछ कर काम करने वाले 
तेरे मन की नहीं सुन रहे 
हो रहा है बंदोबस्त   
जबरन तेरी यात्रा का 

पर क्या तुझको भेजना संभव होगा ... 

असंभव को संभव करने का प्रयास 
अचानक हम दोनों मुस्कुरा उठते हैं ...