बुधवार, 25 जुलाई 2012

चिंतन ...


अनेकों बार पढ़े गीता सार से प्रभावित रचना ... 

जो हुआ 
या जो हो रहा है 
और आगे भी होने वाला है    
सब कुछ बेमानी तो नहीं 

हर होने के पीछे की वजह मालुम हो 
ये जरूरी नहीं 
और जो हुआ या होने वाला है ... वो बेवजह नहीं    
ये कह देना भी जरूरी नहीं 

जो जरूरी है वो ये की हर होने को जीना    
जो होने वाला है उसको तहे दिल से तसलीम करना   

जो होना है वो तो होगा 
वजह जान के बेवजह करना 
या जो होना है उसको न होने देना    
आसान तो न होगा 

तो क्यों न मान लेना ही अच्छा 
की जो हो रहा है अच्छा हो रहा है 
जो होगा वो भी अच्छा ही होगा 
भूत गुज़र गया भविष्य की चिंता न करो 
वर्तमान तो चल रहा है 

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

जिंदगी सिगरेट का धुंवा ...


मुझे याद है 
धुंवे के छल्ले फूंक मार के तोड़ना तुम्हें अच्छा लगता था 

लंबी होती राख झटकना 
बुझी सिगरेट उंगलियों में दबा लंबे कश भरना 
फिर खांसने का बहाना और देर तक हंसना  

कितनी भोली लगतीं थीं तुम 

गर्मियों की दोपहर का ये सिलसिला 
मेरी आदत बन चुका था उन दिनों 
हाथों के फ्रेम बना जब तुम अलग अलग एंगल से मेरा चेहरा देखतीं     
तो मैं अपने आप को तुमसे अलग नहीं देख पाता था   

फिर कई दिन तुम नही आयीं 
सुलगती यादों की आग मेरे जिस्म में बहने लगी   
धुंवे के हर कश के साथ मैं तुम्हें पीने लगा   

सच कहूं तो सिगरेट की आदत इसलिए भी रास आने लगी थी   
क्योंकि उसके धुंवे में तुम्हारा अक्स झलकने लगा था 

अचानक उस शाम 
किसी खामोश बवंडर की तरह तुम मेरे कमरे मे आयीं    
हालांकि तन्हा रात के क़दमों की आहट के साथ तुम चली गयीं हमेशा हमेशा के लिए 
पर जाते जाते मेरे होठ से लगी सिगरेट 
अपनी हाई हील की एड़ी से बुझाते हुवे तुमने बस इतना कहा 
“प्लीज़ ... आज के बाद कभी सिगरेट मत पीना” 

और मैं .... पागल 

अब क्या कहूं 

काश तुमने ये न कहा होता 
कोइ तो बहाना छोड़ा होता मेरे जीने का 
अब तो खाली उंगलियों के बीच अपनी उम्र पीता हूँ 
ऐश ट्रे में जिंदगी की राख झाड़ता हूँ 

लम्हों के “बट” तो अभी भी मिल जायंगे ... 
कुछ बुझे बुझे ... कुछ जलते हुवे धुंवा धुंवा ...   

बुधवार, 11 जुलाई 2012

रंगों के नए अर्थ ...


चलो रंगों को नए अर्थ दें 
नए भाव नए रंग दें 

खून के लाल रंग को 
पानी का बेरंग रंग कहें     
(रंगों की विश्वसनीयता बरकरार रखने के लिए) 

सफ़ेद को नीला 
(आँखों को गहराई तो मिले) 
धूप को काला 
(अधिकतर लोगों के कर्मों को सार्थकता देने के लिए) 
और काले को पीला कर दें 
(कम से कम अंधेरों में रहने वाले  
उज्जवल भविष्य का एहसास तो कर लें) 

सफेद रंग को सिरे से मिटा दें 
अर्थ हटा दें 
भविष्य के लिए शब्द-कोष में सुरक्षित कर दें 
(बदनामी से तो बचा रहेगा बेचारा) 

संभव हो तो इंद्र-धनुष के सात रंगों को मिला कर 
बेरंग सा एक रंग कर दें 
(“मेरे” “तेरे” रंग से बचाने के लिए) 
 
भगवे और हरे को मिला 
एक नया रंग बना दें 
उसे “भारत” नाम दे दें ...  

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

ख़ामोशी की जंग ...


कितनी लंबी है खामोशी की जंग
   
इंच भर दूरी तय करने को
मीलों लंबा सफर
आँखों से कुछ ना कहने का अनवरत प्रयास    
जबरन होठ बंद रखने की जद्दोजहद

और कितनी छोटी है जिंदगी की कशमकश

वक्त के साथ उतर जाता है
चुप होठों के पीछे छुपे बेताब शब्दों का सैलाब 
छोड़ जाता है अपने पीछे
कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा

ऐसे में कभी कभी उम्र भर का सफर काफी नहीं होता
खामोशी को ज़ुबान देने में