मंगलवार, 25 सितंबर 2012

शाम, श्याम ...


छोटी बहर की गज़लों के क्रम में छोटी से छोटी बहर में कुछ कहने का प्रयोग किया है ... आशा है आपको पसंद आएगा ... 

शाम  
श्याम  

जप लो  
नाम  

बोल  
राम   

तू ही  
धाम  

सुर को  
थाम  

खोल   
जाम  

क्या है  
काम  

(गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से) 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

तन्हाई है ...


जो छाई है 
तन्हाई है 

घर की तुलसी 
मुरझाई है    

जो है टूटा  
अस्थाई है 

कल था पर्वत  
अब राई है 

अब शर्म नहीं  
चिकनाई है 

महका मौसम 
तू आई है 

दुल्हन देखो   
शरमाई है 

(गुरुदेव पंकज जी के सुझाव पे कुछ कमियों को दूर करने के बाद) 
  

बुधवार, 12 सितंबर 2012

आज के हालात ...


छोटी बहर की गज़लों के दौर में प्रस्तुत है एक और गज़ल, आशा है पसंद आयगी ...

आवाम हाहाकार है 
सब ओर भ्रष्टाचार है 

प्रतिपक्ष है ऐंठा हुवा 
सकते में ये सरकार है 

सेवक हैं जनता के मगर 
राजाओं सा व्यवहार है 

घेराव की न सोचना 
मुस्तैद पहरेदार है 

रोटी नहीं इस देश में 
मंहगी से मंहगी कार है 

मिल बाँट कर खाते हैं पर 
इन्कार है इन्कार है  

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

अजब ये सिलसिला क्यों ...


इरादा बुलबुला क्यों 
अजब ये सिलसिला क्यों   
  
झड़े पतझड़ में पत्ते 
हवा से है गिला क्यों 

फटे हैं जेब सारे 
हवा में है किला क्यों 

गए जो खुदकशी को 
उन्हें तिनका मिला क्यों 

शहर में दिन दहाड़े 
लुटा ये काफिला क्यों 

विरह की आग में फिर   
तपे बस उर्मिला क्यों 

छला तो इंद्र ने था 
अहिल्या ही शिला क्यों