शुक्रवार, 22 मार्च 2013

शुक्रवार की अल्साई सुबह ...


हमेशा की तरह 
शुक्रवार की अल्साई सुबह 
आज भी दुबई आई  

पर हर शुक्रवार की तरह 
बिस्तर के कोने में पड़ा मोबाइल उठाने की 
हिम्मत नहीं थी आज   

शायद लगने लगा था 
तू इस दुनिया में नहीं रही ...

फिर पता नहीं कब हाथ अपने आप चलने लगे 

जब जागा तो दूसरी ओर फोन की घंटी बज रही थी 

अवचेतन मन 
शायद समझ गया था 

तेरे बिस्तर के किनारे 
आज भी फोन की घंटी बजेगी 
कोई उठाये न उठाये 
तू तो माँ मुझसे जुडी रहेगी ... 

(दुबई में शुक्रवार के दिन छुट्टी होती है ... ओर हर शुक्रवार को माँ कहीं नहीं जाती थी सिर्फ मेरे फोन का इंतज़ार करती थी)