बुधवार, 3 अप्रैल 2013

कुछ बेवजह की बातें ...


लगा तो लेता तेरी तस्वीर दीवार पर 
जो दिल के कोने वाले हिस्से से 
कर पाता तुझे बाहर 

कैद कर देता लकड़ी के फ्रेम में 
न महसूस होती अगर    
तेरे क़दमों की सुगबुगाहट   
घर के उस कोने से 
जहां मंदिर की घंटियाँ सी बजती रहती हैं    

भूल जाता माँ तुझे 
न देखता छोटी बेटी में तेरी झलक 
या सुबह से शाम तेरे होने का एहसास कराता   
अपने अक्स से झांकता तेरा चेहरा 
  
की भूल तो सकता था रौशनी का एहसास भी   
जो होती न कभी सुबह 
या भूल जाता सूरज अपने आने की वजह   

ऐसी ही कितनी बेवजह बातों का जवाब 
किसी के पास नहीं होता