बुधवार, 24 अप्रैल 2013

वक़्त के आगे भला किसकी चली है ...


घर की देहरी से कहां बाहर गई है 
नीव का पत्थर ही बन के माँ रही है 

बचपने में डांट के रोती थी खुद भी 
अब नहीं वो डांटती मुझको कभी है   

घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी 
अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है 

दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी  
घर में जब तक साथ वो मेरे रही है  

रोक लेता मैं अगर ये बस में होता 
वक़्त के आगे भला किसकी चली है