सोमवार, 4 नवंबर 2013

बाज़ुओं में दम अगर भरपूर है

सिर झुकाते हैं सभी दस्तूर है
बाज़ुओं में दम अगर भरपूर है

चाँद सूरज से था मिलना चाहता 
रात के पहरे में पर मजबूर है

छोड़ आया हूँ वहाँ चिंगारियाँ 
पर हवा बैठी जो थक के चूर है

बर्फ की वादी ने पूछा रात से 
धूप की पदचाप कितनी दूर है

हो सके तो दिल को पत्थर मान लो 
काँच की हर चीज़ चकनाचूर है

वो पसीने से उगाता है फसल 
वो यकीनन ही बड़ा मगरूर है

बेटियाँ देवी भी हैं और बोझ भी 
ये चलन सबसे बड़ा नासूर है