गुरुवार, 28 मार्च 2013

यादें ...


सब कहते हैं 
भूलने की कोशिश करो 
पर किसे … ? 

यादों से बाहर निकलो, 
पर किसकी ...? 

खुश रहो 
खुश तो हूं ... अब भी 

तू तब भी साथ थी   
अब भी साथ है   

यादों में थी हमेशा   
यादों में है    

तब बातें करता था तुझसे 
बातें अब भी करता हूं 

हां ... अब ये नहीं मालुम   
क्यों कम्बख्त आंसू 
अपने आप निकल आते हैं 

पर वो तो आँखों का कसूर है न माँ ... 
   

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

शुक्रवार की अल्साई सुबह ...


हमेशा की तरह 
शुक्रवार की अल्साई सुबह 
आज भी दुबई आई  

पर हर शुक्रवार की तरह 
बिस्तर के कोने में पड़ा मोबाइल उठाने की 
हिम्मत नहीं थी आज   

शायद लगने लगा था 
तू इस दुनिया में नहीं रही ...

फिर पता नहीं कब हाथ अपने आप चलने लगे 

जब जागा तो दूसरी ओर फोन की घंटी बज रही थी 

अवचेतन मन 
शायद समझ गया था 

तेरे बिस्तर के किनारे 
आज भी फोन की घंटी बजेगी 
कोई उठाये न उठाये 
तू तो माँ मुझसे जुडी रहेगी ... 

(दुबई में शुक्रवार के दिन छुट्टी होती है ... ओर हर शुक्रवार को माँ कहीं नहीं जाती थी सिर्फ मेरे फोन का इंतज़ार करती थी)

मंगलवार, 12 मार्च 2013

झलक ...


जाड़ों की कुनमुनाती दोपहर 
तंदूर से निकलती गरमा-गरम रोटी 
  
याद है अक्सर तुझे छेड़ता था     
ये कह कर की तेरे हाथों में वो बात नहीं 

ओर माँ तुम्हारी तरफदारी करते करते    
हमेशा प्यार से डांट देती थी मुझे 

कई दिन बाद आज फिर 
वही तंदूर तप रहा है    

देख रहा हूं तेरे माथे पे उभरी पसीने की बूँद     
ताज़ा रोटी की महक में घुलती 
तेरे हाथों की खुशबू 

पता है ... 
आज तुम कुछ कुछ माँ जैसी लग रही हो 

    

मंगलवार, 5 मार्च 2013

तेरी आदत ...



तेरी चीज़ें सब आपस में बाँट रहे थे 
किसी ने साड़ी उठाई 
किसी ने सूट 
किसी ने बुँदे, किसी ने चूड़ी 
किसी ने रूमाल, किसी ने चेन 

तेरी छोटी छोटी चीज़ों का भण्डार  
मानो खत्म ही नहीं होना चाहता था 

तुमसे बेहतर कौन जानता है 
ये चीज़ों की चाह से ज़्यादा 
तुझे अपने पास रखने की होड़ थी माँ 

तू चुपचाप 
दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी 

फिर धीरे से पास आकार कान में बोली 
तू कुछ नहीं लेगा ... 

मैंने लपक कर तेरी किताबों का ढेर उठा लिया 

अब सोचता हूं तो लगता है 
हमेशा से कुछ न कुछ देने की तेरी आदत 
तेरे चले जाने के बाद भी वैसी ही है ...