सोमवार, 27 मई 2013

काजल रोज़ लगाने का मन करता है ...


तुझसे लाड लड़ाने का मन करता है 
बचपन में फिर जाने का मन करता है 
तेरा आना मुश्किल है फिर भी अम्मा 
तुझको पास बुलाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

याद है नानी जब जब घर में आती थी 
तू उस दिन खुद भी बच्चा बन जाती थी 
गाती थी जिन गीतों को तू मस्ती में   
उन गीतों को गाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

लग न जाए नज़र लगाती थी काजल 
लगता था उस वक़्त की अम्मा है पागल 
अब जब सर पे नहीं रहा कोई आँचल 
काजल रोज़ लगाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

करता हूं महसूस तेरा साया अक्सर 
राह में जब भी आता है कोई पत्थर 
कांटे जब जब करते हैं मुझको विचलित 
तेरी गोदी जाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

सोमवार, 20 मई 2013

पत्ते, आँगन, तुलसी माँ ...


चौंका, बर्तन, पूजा, मंदिर, पत्ते, आँगन, तुलसी माँ, 
सब्जी, रोटी, मिर्च, मसाला, मीठे में फिर बरफी माँ, 

बिस्तर, दातुन, खाना, पीना, एक टांग पे खड़ी हुई,   
वर्दी, टाई, बस्ता, जूते, रिब्बन, चोटी, कसती माँ,  

दादा दादी, बापू, चाचा, भईया, दीदी, पिंकी, मैं, 
बहु सुनो तो, अजी सुनो तो, उसकी मेरी सुनती माँ,  

धूप, हवा, बरसात, अंधेरा, सुख, दुख, छाया, जीवन में, 
नीव, दिवारें, सोफा, कुर्सी, छत, दरवाजे, खिड़की माँ,   

मन की आशा, मीठे सपने, हवन समिग्री जीवन की, 
चिंतन, मंथन, लक्ष्य निरंतर, दीप-शिखा सी जलती माँ, 

कितना कुछ देखा जीवन में, घर की देहरी के भीतर, 
इन सब से अंजान कहीं फिर, बैठी स्वैटर बुनती माँ, 

रविवार, 12 मई 2013

मातृ दिवस ...


सब कह रहे हैं 
आज मातृ दिवस है 

तुझे याद करने का दिन 

पर याद तो तब किया जाता है न माँ 
जब किसी को भूला जाए 
तो क्या जो आज का दिन मनाते हैं 
भूल चुके हैं माँ को ...? 

या आज के दिन याद करके 
फिर से भुलाने की तैयारी में हैं माँ को ...? 

शायद ये कोशिश हैं मनाने की उस परपरा को 
जहां माँ तो फिर भी माँ ही रहती है 
पर भूल जाते हैं बच्चे अपने बेटे होने का फ़र्ज़ 

और किसी एक दिन के सहारे ही सही   
उस एहसास को याद कराना भी तो जरूरी है 

हालांकि ये अपनी परंपरा नहीं 
पर तू तो जानती है समय के चक्र को 
परिवर्तन के नियम को 
जिसने घेर लिया है 
हम सबको भी अपने चक्र में 

वैसे भी जब हर दिन तू रहती है साथ 
याद आती है किसी न किसी बहाने  
तो आज एक और बहाने से भी तुझे याद करूं 
कोई बुराई तो नहीं इस बात में ... 

मुझे मालुम है तू हंस रही है आज ...   

सोमवार, 6 मई 2013

भीनी यादें ...


नाज़ुक सा था नाक हमेशा बहती थी 
पल्लू थामें रीं रीं रीं रीं करता था 
धुँधला सा है याद मुझे अब भी अम्मा 
तेरे आगे पीछे फिरता रहता था  

हलकी सी जब चोट कहीं लग जाती थी 
घंटों गोदी में ले कर बहलाती थी  
तेरी आँखें भी गीली हो जाती थीं 
मेरी आँखों से जब आंसू गिरता था 
धुंधला सा है याद ..... 

हिंदी, इंग्लिश, गणित पढाती थी मुझको 
पीटी, गाना, खेल सिखाती थी मुझको 
रोज़ नए पकवान खिलाती थी मुझको 
मन ही मन मैं तेरी पूजा करता था 
धुंधला स है याद .....

बिन मांगे ही सब कुछ तू दे देती थी 
पता नहीं कैसे सब कुछ सुन लेती थी 
ज्ञानी है तू या फिर अंतर्यामी है 
मेरे दिल को अक्सर ऐसा लगता था 
धुंधला सा है याद .....

मेरी बातों को तू सुनती रहती थी 
जाने कौन से सपने बुनती रहती थी 
साथ सदा तू मेरे जागा करती थी 
पढ़ने को जब चार बजे में उठता था 
धुंधला सा है याद .....