बुधवार, 24 जुलाई 2013

वत्सल काया ...

पता होता है उन्हें 
की रौशनी का एक जलता चिराग जरूर होता है अंधेरे के उस छोर पे 
जहां बदलने लगती है जीवन की आशा, घोर निराशा में 
की मुश्किलों की आंच से जलने वाला चराग   
उस काया ने ही तो रक्खा होता है दिल के किसी सुनसान कोने में 

पता होता है उन्हें 
की नहीं मिलते खुशियों के खजाने उस तिलिस्मी दुनिया से   
जिसका दरवाज़ा बस, बस में है अलीबाबा के 
उन चालिस चोरों के अलावा 
की जिंदगी की हर शै मैं बिखरी खुशियां ढूँढने का फन 
चुपचाप उस काया ने ही उतारा होता है गहरे कहीं    

पता होता है उन्हें  
की कट जाएंगे जिंदगी के तमाम ऊबड़ खाबड़ रस्ते, सहज ही 
की उस खुरदरी सतह पे चलने का हुनर भी सिखाया होता है उसी काया ने   

ओर फिर साथ होता है एहसास, उस काया का  
जो कभी अकेला नहीं होने देता 

पंछी जब छोड के जाते हैं घोंसला, लौटने के लिए 
तो पता होता है उन्हें की खड़ी होगी झुर्रियों से लदी वत्सल काया     
असीसों से लदे दो हाथ उठाये, उनके इंतज़ार में 

तैयार तो मैं भी था, (या शायद नहीं था) लौटने को उस घरोंदे में 
पर देर तो हो ही गई थी मुझसे   

उस वत्सल काय की जगह, अब तेरी तस्वीर टंगी है माँ  

बुधवार, 17 जुलाई 2013

माँ

रात में दादी के पांव दबाती   
पिता के कमजोर कंधे मजबूती से थामे 
घर की चरमराती दिवार हाथों पे उठाए  
पैरों में चक्री लगाए हर शै में नज़र आती 
थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी   

महीने की पहली तारीख 
सिगरेट के पैसे निकालने का बाद 
बची पगार माँ के हाथ में थमाने के अलावा 
पिताजी बस खेलते थे ताश 
(हालांकि ये शिकायत नहीं, 
और माँ को तो बिलकुल नहीं) 
कभी नहीं देखा उन्होंने खर्चे का हिसाब 
मेरी बिमारी से लेकर मुन्नी की किताबों का जवाब 
सब कुछ अपने सर पे रक्खे 
थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी 

हालांकि होता था पापा का नाम  
बिरादरी में लगने वाले हर तमगे के पीछे 
मेरे नम्बरों से लेकर मुन्नी के मधुर व्यवहार तक 
कई बार देखा है पापा को अपनी पीठ थपथपाते 
पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ 
जो हो के भी हर जगह, नहीं होती थी कहीं 

सुना है बड़े बूढों से, ज्ञानी संतों से 

भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते 
  

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

माँ का हिस्सा ...

मैं खाता था रोटी, माँ बनाती थी रोटी    
वो बनाती रही, मैं खाता रहा    
न मैं रुका, न वो 
उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ   

सुबह से शाम तक इंसान बनाने की कोशिश में  
करती रही वो अनगिनत बातें, अनवरत प्रयास      
बिना कहे, बिना सोचे, बिना किसी दर्द के   

कांच का पत्थर तराशते हाथों से खून आने लगता है   
पर माँ ने कभी रूबरू नहीं होने दिया 
अपने ज़ख्मों से, छिले हुए हाथों से   
हालांकि आसान नहीं था ये सब पर माँ ने बाखूबी इसे अंजाम दिया 

अब जब वो नहीं है मेरे साथ 
पता नहीं खुद को इन्सान कहने के काबिल हूं या नहीं 

हां ... इतना जानता हूं 
वो तमाम बातें जो बिन बोले ही माँ ने बताई 
शुमार हो गई हैं मेरी आदतों में 

सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं 
पर विश्वास है माँ की कोशिश पे 
क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन 

और फिर ... 
मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं 

बुधवार, 3 जुलाई 2013

यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी ...

अपने मन की बातें तब तब बोलती थी    
यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी 

गीत पुरानी फिल्मों के जब गाती थी 
अल्हड बचपन में खुद को ले जाती थी 
कानों में जैसे शक्कर सा घोलती थी   
यादों की खिड़की ... 

मुश्किल न हो घर में उसके रहने से  
ठेस न लग जाए उसके कुछ कहने से  
कहने से पहले बातों को तोलती थी  
यादों की खिड़की ... 

नब्बे के दद्दा थे, बापू सत्तर के  
लग जाती थी चोट, फर्श थे पत्थर के     
साठ की अम्मा पर घूंघट में डोलती थी   
यादों की खिड़की ...