मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

झूठ चादर से ढक नहीं पाते ...

वो जो पत्थर चमक नहीं पाते 
बीच बाज़ार बिक नहीं पाते 

टूट जाते हैं वो शजर अक्सर 
आँधियों में जो झुक नहीं पाते   

फाइलों में दबा दिया उनको 
कितने मज़लूम हक नहीं पाते   

रात जितनी घनी हो ये तारे 
धूप के आगे टिक नहीं पाते  

सिलसिला कायनात का ऐसा 
रात हो दिन ये रुक नहीं पाते 

पांव उनके निकल ही आते हैं 
झूठ चादर से ढक नहीं पाते  

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

परों के साथ बैसाखी लगा दी ...

समय ने याद की गुठली गिरा दी 
लो फिर से ख्वाब की झाड़ी उगा दी 

उड़ानों से परिंदे डर गए जो 
परों के साथ बैसाखी लगा दी 

किनारे की तरफ रुख मोड़ के फिर 
हवा के हाथ ये कश्ती थमा दी 

दिया तिनका मगर इक छेद कर के 
कहा हमने वफादारी निभा दी 

कहां हैं मानते इसको परिंदे 
जो दो देशों ने ये सीमा बना दी 

बुजुर्गों के दिलों पे रख के पत्थर 
दरों दीवार बच्चों ने उठा दी 

तेरी यादें जुडी थीं साथ जिसके 
लो हमने आज वो तितली उड़ा दी 

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

सुरमई रंगों से अपनी दास्तां लिक्खी हुई ...

मुद्दतों से कैद हैं कुछ पर्चियां लिक्खी हुई 
पूछना ना कौन से पल में कहां लिक्खी हुई    

बंदिशें हैं तितलियों के खिलखिलाने पे यहाँ 
इस हवेली की बुलंदी पे खिज़ां लिक्खी हुई 

पोटली में माँ हमेंशा ढूंढती रहती है कुछ 
कतरनें हैं कुछ पुरानी खत नुमा लिक्खी हुई 

आईने में है हुनर वो देख लेगा दूर से  
उम्र की ताज़ा लकीरों में फ़ना लिक्खी हुई 
 
पढ़ रही है आसमानी हर्फ़ में बादे सबा 
इश्क की कोई इबारत दरमयां लिक्खी हुई 

इस शहर के पत्थरों को देखना मिल जाएगी     
सुरमई रंगों से अपनी दास्तां लिक्खी हुई 

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

जेब में खंजर छुपा के लाएगा ...

जब सुलह की बात करने आएगा 
जेब में खंजर छुपा के लाएगा 

क्यों बना मजनू जो वो लैला नहीं   
उठ विरह के गीत कब तक गाएगा 

एक पत्थर मार उसमें छेद कर 
उड़ गया बादल तो क्या बरसाएगा 

चंद खुशियाँ तू भी भर ले हाथ में 
रह गया तो बाद में पछताएगा 

छीन ले शमशीर उसके हाथ से 
मार कब तक बेवजह फिर खाएगा 

दर्द पर मरहम लगा दे गैर के 
देख फिर ये आसमां झुक जाएगा 

तू बिना मांगे ही देना सीख ले 
देख बिन मांगे ही सबकुछ पाएगा