सोमवार, 27 जनवरी 2014

मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए ...

इकट्ठा हो गए हैं लोग तो तक़रीर हो जाए
करो इतनी मेहरबानी जुबां शमशीर हो जाए

जो दिल की आग है इतना जले की रौशनी बनके
मेरा चेहरा मेरे ज़ज़्बात की तहरीर हो जाए

सभी के हाथ में होती है किस्मत की भी इक रेखा
जो किस्मत में नहीं क्यों चाहते जागीर हो जाए

इनायत हो तेरी मुझको सिफत इतनी अता कर दे
लिखूँ जो हूबहू वैसी मेरी तकदीर हो जाए

कहाँ बनते हैं राँझा आज के इस दौर में आशिक
मगर सब चाहते माशूक उनकी हीर हो जाए

गज़ल कहता हूँ पर मेरे खुदा इतनी इनायत कर
मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए