सोमवार, 10 मार्च 2014

पूरी होती एक दुआ ...

कुछ बातों को ज़हन में आने से रोकना मुमकिन नहीं होता ... कुछ पल हमेशा तैरते रहते हैं यादों के गलियारे में ... कुछ एहसास भी मुद्दतों ताज़ा रहते हैं ... ज़िंदगी गिने-चुने लम्हों के सहारे भी बिताई जा सकती है बशर्ते उन लम्हों में तुम हो और हो पूरी होती एक दुआ ...

चाहता हूँ तुम बनो शहजादी
कि सोना चाहता हूँ तुम्हारी बाहों को सिरहाना बना कर
पूरब की खिड़की पे डाल देना अँधेरे का पर्दा
रोक लेना ये चाँद ज़िंदगी के फिसल जाने तक
कि लेना चाहता हूँ इक लंबी नींद
तुमसे लिपट कर

आसमान से गिरते हर तारे के साथ
रख देता हूँ एक दुआ
कि देखता होगा मेरी दुआओं का "खाता" कोई
कुछ तो होगा निज़ाम इस दुनिया को बनाने वाले का
माँ अक्सर कहा करती थी किस्मत वाला हूँ मैं

मीलों फैला रेत का पीला समुन्दर
इसलिए भी मुझे अच्छा लगने लगा है
कि बना सकता हूँ तेरे अनगिनत मिट्टी के पुतले
कि डालना चाहता हूँ उनमें जान
कि मांगी हैं लाखों दुआएं उस खुदा से
कुछ पल को कायनात का निज़ाम पाने की