सोमवार, 30 जून 2014

दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया ...

पानी हवा थी धूप पनपना नहीं आया
गमले के फूल को तो महकना नहीं आया

जो सोचते थे कैद नहीं, घर है ये पिंजरा
उनको खुली हवा में चहकना नहीं आया

तलवार की तो धार पे चलते रहे थे हम
उनकी गली से हमको गुज़ारना नहीं आया

रह रह के मुझे दिख रहा है एक ही चेहरा
कैसे कहूं की दिल को धड़कना नहीं आया

मजबूत छत भिगो न सके तोड़ दी झुग्गी
गुस्ताख़ बादलों को बरसना नहीं आया

अरमान हैं ये दिल के या गीली सी है लकड़ी
मुद्दत से जल रही है धधकना नहीं आया

ज़ुल्मों सितम पे खून यहाँ खौलता तो है
दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया