सोमवार, 24 नवंबर 2014

गांधी की तस्वीर लगाई होती है ...

आसमान पे नज़र टिकाई होती है
खेतों में जब फसल उगाई होती है 

शहरों की चंचल चितवन के क्या कहने
मेकप की इक परत चढ़ाई होती है

दफ्तर में तो धूल जमी होती है पर
गांधी की तस्वीर लगाई होती है

उनका दिल टूटा तो वो भी जान गए
मिलने के ही बाद जुदाई होती है

चौड़ा हो जाता है बापू का सीना
बेटे की जिस रोज कमाई होती है

बूढी कमर झुकी होती है पर घर की
जिम्मेदारी खूब उठाई होती है

हो जाता है दिल सूना, घर सूना सा
बेटी की जिस रोज बिदाई होती है

चलते चलते एक और शेर ...
जिसने भी ये आग लगाई होती है
तीली हलके से सुलगाई होती है





सोमवार, 17 नवंबर 2014

धूप छाँव उम्र निकलती रही ...

बूँद बूँद बर्फ पिघलती रही
ज़िंदगी अलाव सी जलती रही

चूड़ियों को मान के जंजीर वो
खुद को झूठे ख्वाब से छलती रही

है तेरी निगाह का ऐसा असर
पल दो पल ये साँस संभलती रही

मौसमों के खेल तो चलते रहे
धूप छाँव उम्र निकलती रही

गम कभी ख़ुशी भी मिली राह में
कायनात शक्ल बदलती रही

रौशनी ही छीन के बस ले गए
आस फिर भी आँख में पलती रही


सोमवार, 10 नवंबर 2014

सुर्ख़ियों में न कभी खबर में आ सके ...

शाम आ सके न वो सहर में आ सके
दर्द फिर कभी न रह-गुज़र में आ सके

कायनात प्रेम से सजा दो इस कदर
लौट के वो शख्स अपने घर में आ सके

जिक्र है हमारा महफ़िलों में आज भी
पर कभी न आपकी नज़र में आ सके

दो ही आंसुओं ने डाल दी थी बेड़ियाँ
फिर कभी न लौट के सफ़र में आ सके

हद से बढ़ गई थी बेरुखी जनाब की
इसलिए न अपने हम शहर में आ सके

मर मिटे जो सिरफिरे वतन की आन पर
सुर्ख़ियों में ना कभी खबर में आ सके 

सोमवार, 3 नवंबर 2014

गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता ...

ये माना साथ निभाना हमें नहीं आता
किसी को छोड़ के जाना हमें नहीं आता

वो जिसकी जेब में खंजर ज़ुबान पर मिश्री
उसी से हाथ मिलाना हमें नहीं आता

मिलेगी हमको जो किस्मत में लिखी है शोहरत
किसी के ख्वाब चुराना हमें नहीं आता

हुनर है दर्द से खुशियों को खींच लाने का
विरह के गीत सुनाना हमें नहीं आता

खुदा का शुक्र है इन बाजुओं में जुंबिश है
निवाला छीन के खाना हमें नहीं आता

इसे ग़ज़ल न कहो है फकत ये तुकबंदी
गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता