रविवार, 22 मार्च 2015

रफ़्तार ...

बुलंदी का नशा हर नशे से गहरा होता है ... तरक्की की रफ़्तार आजू-बाजू कुछ देखने नहीं देती ... प्रेम, इश्क, रिश्ते, नाते, अपनेपन का एहसास, सब कुछ बस एक छलांग मार के निकल जाना ... एक ही झटके में पा लेने का उन्माद, एक हवस जो भविष्य का सोचने नहीं देती ... चमक जो थकान के बाद आने वाले दिन देखने नहीं देती ...

कितनी अजीब बात है
सागर के इस छोर से उस छोर तक
धरती के इस कोने से उस कोने तक
बस भागता ही रहा

ये मिल जाए वो मिल जाए
ये मिल गया अब वो पाना है
सब कुछ पा लेने की होड़ में
दुनिया की हर सड़क आसानी से नाप डाली

पर नहीं नाप सका तो उसके दिल तक की दूरी
हालांकि मुश्किल नहीं था उस सड़क को पार करना
उस एक लम्हे को बाहों में समेटना
दो कदम की दूरी नापना

अब जबकि दुनिया नाप लेने के बाद
उसी जगह पे वापस हूँ
(शायद भूल गया था दुनिया गोल है)
और चलने की शक्ति लगभग जवाब दे रही है
कोई अपना नहीं इस ठिकाने पर
सिवाए तन्हाई और गहरी उदासी के

भूल गया था की याद रखना होता है
उम्र, गति और दूरी का हिसाब भी ज़िन्दगी की रफ़्तार में
रिश्ते, नातों और अपनों के साथ के साथ