रविवार, 26 जुलाई 2015

चुभते हैं इस कदर से तेरी याद के नश्तर ...

जो लोग आज खून मिटाने नहीं देते
रस्ता वही तो मिल के बनाने नहीं देते

कुछ लोग जो गुनाह की खेती के हैं माहिर
इंसानियत की फसल उगाने नहीं देते

जागीर आसमां को समझने लगे अपनी
परवाज़ पंछियों को लगाने नहीं देते

करते हैं सच के साथ की तो पैरवी अक्सर
पर आईने को सच भी दिखाने नहीं देते

खुद दोस्ती की आड़ में हैं घौंपते खंजर
पर दुश्मनों से हाथ मिलाने नहीं देते

जो तीरगी की कैद में रहने के हैं आदी
घर जुगनुओं को रात में आने नहीं देते

चुभते हैं इस कदर से तेरी याद के नश्तर
नाकाम दौरे-इश्क भुलाने नहीं देते

रविवार, 19 जुलाई 2015

वफ़ा के उस पुजारी को भुला दे ...

मुझे ता उम्र काँटों पर सुला दे
मगर बस नींद आने की दुआ दे

थके हारों को पल भर सुख मिलेगा
हवा चल कर पसीना जो सुखा दे

सजा अपनी करूंगा मैं मुक़र्रर
गुनाहों से मेरे पर्दा उठा दे

बराबर से मिलेगी धूप सबको
ये सूरज फैंसला अपना सुना दे

चुनौती दी है जो परवाज़ की तो
मुझे आकाश भी खुल कर खुला दे

कदम दो साथ मिल कर चल न पाया
वफ़ा के उस पुजारी को भुला दे
  

रविवार, 12 जुलाई 2015

सोच लो ताज हो न ये सर का ...

रास्ता जब तलाशने निकले
खुद के क़दमों को नापने निकले

रोक लेते जो रोकना होता
हम तो थे सब के सामने निकले

जिंदगी दांव पे लगा डाली
इश्क में हम भी हारने निकले

कब से पसरा हुआ है सन्नाटा
चीख तो कोई मारने निकले

चाँद उतरा है झील में देखो
लोग पत्थर उछालने निकले

सोच लो ताज हो न ये सर का
तुम जो बोझा उतारने निकले

रविवार, 5 जुलाई 2015

दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए ...

कविताओं के दौर से निकल कर प्रस्तुत है एक गज़ल, आशा है आप को पसंद आएगी ...

बाज़ुओं को तोल कर बोझा उठाना सीखिए
रुख हवा का देख कर कश्ती चलाना सीखिए

गम के बादल आज हैं कल धुप होगी गुनगुनी
दर्द होठों पर छुपा कर मुस्कुराना सीखिए

ज़िंदगी देती है मौका हर किसी इंसान को
लक्ष्य पर ही भेद हो ऐसा निशाना सीखिए

वादियों की हर अदा में प्रेम का संगीत है
पंछियों के साथ मिल कर गुनगुनाना सीखिए

ज़िंदगी में क्या पता फिर कौन से हालात हों
दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए