बुधवार, 26 अगस्त 2015

मिलते रहे तो प्यार भी हो जाएगा कभी ...

कहती है मोम यूँ ही पिघलना फ़िज़ूल है
महलों में इस चिराग का जलना फ़िज़ूल है

खुशबू नहीं तो रंग अदाएं ही ख़ास हों
कुछ भी नहीं तो फूल का खिलना फ़िज़ूल है

सूरज ढले निकलना जो जलती मशाल हो
जो रात ढल गयी तो निकलना फ़िज़ूल है

बदलेंगे हम नहीं ये कहा उनके कान में
हमको हैं बोलते न बदलना फ़िज़ूल है

छींटे जो चार मार दिए बैठ जाओगे
पीतल के बरतनों में उबलना फ़िज़ूल है

मिलते रहे तो प्यार भी हो जाएगा कभी
यूँ मत कहो की आप से मिलना फ़िज़ूल है

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

धूप को वो छोड़ के घर आ गया ...

फोड़ के सभी का वो सर आ गया
उसमें पत्थरों का असर आ गया

बोल दो चिराग से छुप कर रहे
तेज़ आंधियों का शहर आ गया

छंट गए गुबार सभी धूल के
बादलों का झुण्ड जिधर आ गया

दुश्मनी रहेगी कभी भी नहीं
भूल जाने का जो हुनर आ गया

देखते न खुद के मुंहासे कभी
दूसरों का तिल भी नज़र  गया

जुगनुओं की एक झलक क्या मिली
धूप को वो छोड़ के घर आ गया

पिछले कई दिनों से घर से दूर एरिज़ोना, यूं. एस. में हूँ, आज समय मिलने पे आपसे मुखातिब हूँ, उम्मीद है जल्दी ही ब्लॉग पे नियमित होऊंगा

रविवार, 2 अगस्त 2015

ज़िन्दगी यूँ ही बसर होती रहे ...

ज़िंदगी उनकी नजर होती रहे
खूबसूरत ये डगर होती रहे

सादगी इतनी है तेरे रूप में
बंदगी आठों पहर होती रहे

मैं उठूं तो हो मेरे पहलू में तू
रोज़ ही ऐसी सहर होती रहे

डूबना मंज़ूर है इस शर्त पे
प्यार की बारिश अगर होती रहे

तेज़ तीखी धूप लेता हूँ मगर
छाँव पेड़ों की उधर होती रहे

मुद्दतों के बाद तू है रूबरू
गुफ्तगू ये रात भर होती रहे

माँ का साया हो सदा सर पर मेरे
ज़िन्दगी यूँ ही बसर होती रहे