शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

माँ ...

फर्क करना मुश्किल होता है की तू यादों में या असल में साथ होती है (सच कहूं तो फर्क करना भी नहीं चाहता) ... हाँ जब कभी भी तेरी जरूरत महसूस होती है तू आस-पास ही होती है ... माँ है मेरी कहाँ जा सकती है मुझसे दूर ...

यकीनन तू मेरी यादों में अम्मा मुस्कुराती है
तभी तो खुद ब खुद चेहरे पे ये मुस्कान आती है

तो क्या है सब दिगंबर नाम से हैं जानते मुझको
मुझे भाता है जब तू प्यार से छोटू बुलाती है

में घर से जब निकलता हूँ बड़े ही लाड से मुझको
लगे कोई नज़र न आज भी काजल लगाती है

बुरी आदत कभी जब देख लेती है मेरे अन्दर
नहीं तू डांटने से आज भी फिर हिचकिचाती है

में बचपन में जरा कमजोर था पर आज भी अक्सर
फकीरों की मजारों पर मेरा माथा टिकाती है

रफ़ी आशा लता गीता सुरैया या तलत सहगल
पुराने गीत हों तो साथ अम्मा गुनगुनाती है

बढ़ा के हाथ अपना थाम लेती है वो चुपके से
मेरी कश्ती भंवर में जब कभी भी डगमगाती है










रविवार, 13 सितंबर 2015

इंसान बन के रह सकूं तो इत्मीनान हो ...

मैं सो सकूं मौला मुझे इतनी थकान हो
आकाश को छूती हुई चाहे उड़ान हो

सुख दुःख सफ़र में बांटना आसान हो सके
मैं चाहता हूँ मील के पत्थर में जान हो

है दर्द जो साझा तो मिल के सब ही बोल दें
मैं चाहता हूँ हाथ में सब के कमान हो

जब मौत का दिन तय नहीं तो हार किस लिए
जब तक रहे इंसान उसका दिल जवान हो

सुख चैन हो, कुछ कहकहे, थोड़ा सुकून भी
हर शहर के बाज़ार में ऐसी दुकान हो

इस दौर के उन्माद को रोकूंगा किस तरह
इंसान बन के रह सकूं तो इत्मीनान हो   

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

किसी की याद के मंज़र पिघल गए होंगे ...

किसी की आँख से आंसू निकल गए होंगे
मुसाफिरों के इरादे बदल गए होंगे

कहीं से फ़ैल गयी होगी बात आने की
तभी तो हाथ के कंगन मचल गए होंगे

किसी के ख्वाब में तस्वीर जो बनी होगी
किसी के याद के मंज़र पिघल गए होंगे

ये रौशनी का नहीं फलसफा है रिश्तों का
ढली जो रात सितारे भी ढल गए होंगे

ये सिलसिला तो यकीनन मनाएंगे मिल कर
शमा जली तो पतंगे भी जल गए होंगे

मेरे ही नाम को जपती हो रात दिन जाना
तुम्हारे चाहने वाले तो जल गए होंगे