शुक्रवार, 25 मार्च 2016

देखो परख लो सच सभी इस प्यार से पहले ...

हो दिल्लगी ना, सोच लो इज़हार से पहले
देखो परख लो सच सभी इस प्यार से पहले

अपने गुनाहों को कभी भी मान मैं लूँगा
पर हो खुले में पैरवी इकरार से पहले

टूटा अगर तो जुड़ न पाएगा कभी रिश्ता
सोचो हज़ारों बार तुम व्यवहार से पहले

जो दिल में है सब खुल के उनको बोलने तो दो
मौका जरूरी है किसी इनकार से पहले

यूँ ही नहीं सर टेकना गर देवता भी हो
ठोको बजा कर देख लो सत्कार से पहले

तैयार हूँ मैं हारने को जंग दुनिया की
तुम जीत निष्चित तो करो इस हार से पहले

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

बस यही माँ की इक निशानी थी ...

ट्रंक लोहे का सुरमे-दानी थी
बस यही माँ की इक निशानी थी

अब जो चुप सी टंगी है खूँटी पे
ख़ास अब्बू की शेरवानी थी

मिल के रहते थे मौज करते थे
घर वो खुशियों की राजधानी थी

झील में तैरते शिकारे थे
ठण्ड थी चाय जाफ़रानी थी

छोड़ के जा रही थी जब मुझको
मखमली शाल आसमानी थी

उम्र के साथ ही समझ पाया
हाय क्या चीज़ भी जवानी थी

उफ़ ये गहरा सा दाग माथे पर
बे-वफ़ा प्यार की निशानी थी
(तरही गज़ल) 

बुधवार, 2 मार्च 2016

पल दो पल सुस्ताना सीख ...

झगड़ों को निपटाना सीख
रिश्तेदार बनाना सीख

खुद पे दाव लगाना है तो
अपना बोझ उठाना सीख

घाव तो अक्सर भर जाते हैं
गहरे दाग मिटाना सीख

मुद्दत से जो साथ है तेरे
उसका साथ निभाना सीख

बैठी होगी भूखी प्यासी
सही समय घर जाना सीख

तेजी के इस दौर में भईया
पल दो पल सुस्ताना सीख