सोमवार, 16 अप्रैल 2018

यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली ...


जाने किसने भेजी है पर मुझको तो बे-नाम मिली
आज सुबह दरवाज़ा खोला तो अख़बार के नीचे से
यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली

टूटी निब, पेन्सिल के टुकड़े, साइकिल की टूटी गद्दी
दागी कंचे, गोदे लट्टू, चरखी से लिपटी सद्दी
छुट्टी के दिन सुबह से लेकर रात तलक की कुछ बातें
बीते काल-खंड की छाया अनायास बे-दाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

दंगल, मेले, नौटंकी की खुशियों में डूबी बस्ती
हाथ से चलने वाले लकड़ी के झूलों की वो मस्ती
दद्दा के कंधे से देखी रावण की जलती हस्ती
दिल के गहरे तहखाने से जाने किसके नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

पीठ मिली जो पिट्ठू की गेंदों से सिक के लाल हुई
गिल्ली जो डंडे के हाथों पिट-पिट कर बेहाल हुई
छोटी बेरी के काँटों से दर्द में डूबी इक ऊँगली 
भूतों की आवाजों वाली इक कुटिया बदनाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

धूप मिली जो घर के आँगन में अकसर आ जाती थी
गाय मिली जो बासी रोटी छिलके सब खा जाती थी
वो कौवा जो छीन के रोटी हाथों से उड़ जाता था
फिर अतीत से उड़ कर मैना कोयल मेरे नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

कुछ अपनी जानी पहचानी अपनी ही आवाज़ मिली
ताल मिलाती मेज, तालियाँ, सपनों की परवाज़ मिली
टूटे शेर, अधूरी नज्में, आँखों में गुजरी रातें
फिर किताब के पीले पन्नों पर अटकी इक शाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

राम से ज्यादा लखन के नाम ये बनवास है ...


जिनके जीवन में हमेशा प्रेम है, उल्लास है
दर्द जितना भी मिले टिकता नहीं फिर पास है  

दूसरों के घाव सिलने से नहीं फुर्सत जिन्हें
अपने उधड़े ज़ख्म का उनको कहाँ आभास है

होठ चुप हैं पर नज़र को देख कर लगता है यूँ
दिल धड़कता है मेरा शायद उन्हें एहसास है

दिन गुज़रते ही जला लेते हैं अपने जिस्म को
जुगनुओं का रात से रिश्ता बहुत ही ख़ास है

आंधियां उस मोड़ से गुज़रीं थी आधी रात को
दीप लेकिन जल रहे होंगे यही विश्वास है

सिरफिरे लोगों का ही अंदाज़ है सबसे जुदा
पी के सागर कह रहे दिल में अभी भी प्यास है 

हों भले ही राम त्रेता युग के नायक, क्या हुआ 
राम से ज़्यादा लखन के नाम ये बनवास है

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

कुछ ख़त हमारी याद के पन्नों से धुल गए ...

लम्हे जो गुम हुए थे दराजों में मिल गए 
दो चार दिन सुकून से अपने निकल गए

डट कर चुनौतियों का किया सामना मगर
दो आंसुओं के वार से पल भर में हिल गए

दुश्मन के तीर पर ही ये इलज़ाम रख दिया
किस किस को कहते यार के खंज़र से छिल गए 

इतिहास बन गए जो समय पर चले नहीं 
बहते रहे दरिया तो समुंदर से मिल गए

कहते थे आफ़ताब पे रखते हैं नियन्त्रण
कल रात माहताब के हाथों जो जल गए

तो क्या हुआ जो होठ पे ताला लगा लिया
आँखों से आपके तो कई राज़ खुल गए

अल्जाइमर है या के तकाज़ा है उम्र का
कुछ ख़त हमारी याद के पन्नों से धुल गए

सोमवार, 26 मार्च 2018

जीत या हार ...


सपने पालने की कोई उम्र नहीं होती

वो अक्सर उतावली हो के बिखर जाना चाहती थी
ऊंचाई से गिरते झरने की बूँद सरीखी
ओर जब बाँध लिया आवारा मोहब्बत ने उसे ... 
उतर गई अंधेरे की सीडियां, आँखें बंद किए

ये सच है वो होता है बस एक पल 
बिखर जाने के बाद समेटने का मन नहीं होता जिसे

उम्र की सलेट पर जब सरकती है ज़िंदगी
कायनात खुद-ब-खुद बन जाती है चित्रकार
हालांकि ऐसा दौर कुछ समय के लिए आता है सबके जीवन में

(ओर वो भी तो इसी दौर से गुज़र रही थी
मासूम सा सपना पाले)

फिर आया तनहाई का लम्बा सफ़र

उजली बाहों के कई शहसवार वहां से गुज़रे
पर नहीं खुला सन्नाटों का पर्दा ...
उम्र काफी नहीं होती पहली मुहब्बत भुलाने को   
जुम्बिश खत्म हो जाती है आँखों की   
पर यादें ...
वो तो ताज़ा रहती हैं जंगली गुलाब की खुशबू लिए 

ये जीत है आवारा मुहब्बत की या हार उस सपने की
जिसको पालने की कोई उम्र नहीं होती

सोमवार, 19 मार्च 2018

समय - एक इरेज़र ... ?


यादें यादें यादें ... क्यों आती हैं ... कब आती हैं ... कैसे आती हैं ... जरूरी है यादों की यादों में रहना ... या साँसों  का हिसाब रखना ... या फिर जंगली गुलाब का याद रखना ...

सांसों के सिवा
मुसलसल कुछ नहीं जिंदगी में
वैसे तिश्नगी भी मुसलसल होती है
जब तक तू नहीं होती

पतझड़ का आना बेसबब नहीं 
सूखे पत्तों के चटखने की आवाज़ से
कितनी मिलती जुलती है
तेरी हंसी की खनक  

यादें आएं इसलिए ज़रूरी है
किसी का चले जाना जिंदगी से
हालाँकि नहीं भरते समय की तुरपाई से
कुछ यादों के हल्के घाव भी

कोरे कैनवस में रंग भरने के लिए 
जैसे ज़रूरी है यादों का सहारा
उतना ही ज़रूरी है 
अपने आप से बातें करना

अज़ाब बन के आती हैं जंगली गुलाब की यादें 
समय वो इरेज़र नहीं जो मिटा सके ...

सोमवार, 12 मार्च 2018

सफ़र जो आसान नहीं ...


बेतहाशा फिसलन की राह पर
काम नहीं आता मुट्ठियों से घास पकड़ना  
सुकून देता है उम्मीद के पत्थर से टकराना
या रौशनी का लिबास ओढ़े अंजान टहनी का सहारा 
थाम लेती है जो वक़्त के हाथ 

चुभने के कितने समय बाद तक
वक़्त का महीन तिनका 
घूमता रहता है दर्द का तूफानी दरिया बन कर
पाँव में चुभा छोटा सा लम्हा
शरीर छलनी होने पे ही निकल पाता है

अभी सुख की खुमारी उतरी भी नहीं होती 
आ जाती है दुःख की नई लहर
आखरी पाएदान पे जो खड़ी होती है सुख के  

हर आग की जलन एक सी 
किसी ठहरे हुवे सवाल की तरह
लम्हों की राख रह जाती है जगह जगह इतिहास समेटे
हाथ लगते ही ख्वाब टूट जाता है
सवाल खड़ा रहता है

उम्मीद का उजाला
आँखों का काजल बन के नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद
किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को

किसी साए के सहारे भी तो जिंदगी नहीं चलती

सोमवार, 5 मार्च 2018

क़र्ज़ मुहब्बत का ...


उम्र खर्च हो जाती है लम्हा लम्हा
तुम्हारी यादों का सिलसिला ख़त्म नहीं होता

कडाके की ठंड और बरसाती लम्हों के बीच
बूढ़ी होती दूकान से उठती अदरक वाली चाय की महक 
खाली कप पे ताज़ा लिपस्टिक के निशान
कुछ साए उठ के गए हैं यहाँ से अभी 
क़दमों के निशान कितने मिलते हैं तेरे मेरे क़दमों से

हवा के झोंके उड़ा ले जाते हैं पीले पत्ते
पी लेती है नुक्कड़ की तनहाई उनका दर्द  
जैसे तुम ढांक देती थीं मुहब्बत का आँचल  
वक़्त के साथ सिकुड़ते हुए उस कोने में मिलती हो रोज़ 
सूखे पत्तों से मुहब्बत का खेल खेलते

डूबते सूरज के साथ नहीं डूबती तुम्हारी रौशनी
चाँद के साथ हो लेती है
सूरज उठा लेता है तुम्हे चाँद के पहलू से सुबह
चलता रहता है कायनात का कारोबार
तेरी मुहब्बत की रौशनी भी खेलती है ऐसे खेल

नहीं थकते दीवार पे टंगे तुम्हारे कंधे
झेलते हैं रात भर सांसों का बोझ
कुछ यादें जैसे चुका रही हैं प्रेम की किश्तें
मुहब्बत का क़र्ज़ ख़त्म होने का नाम नहीं लेता  

मद्र स्वर में विलंबित गति का गीत है मुहब्बत
खामोश ताल पे अनवरत बजता हुआ  
किरदार हैं जो बदलते हैं समय के साथ

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

साक्षात्कार ब्रह्म से ...

ढूंढता हूँ बर्फ से ढंकी पहाड़ियों पर
उँगलियों से बनाए प्रेम के निशान
मुहब्बत का इज़हार करते तीन लफ्ज़
जिसके साक्षी थे मैं और तुम
और चुप से खड़े देवदार के कुछ ऊंचे ऊंचे वृक्ष    

हाँ ... तलाश है बोले हुए कुछ शब्दों की 
जिनको पकड़ने की कोशिश में
भागता हूँ सरगोशियों के इर्द-गिर्द
दौड़ता हूँ पहाड़ पहाड़, वादी वादी

सुना है लौट कर आती हैं आवाजें
ब्रह्म रहता है सदा के लिए कायनात में 
श्रृष्टि में बोला शब्द शब्द

हालांकि मुश्किल नहीं उस लम्हे में लौटना   
पर चाहत का कोई अंत नहीं 

उम्र की ढलान पे 
अतीत के पन्नों में लौटने से बेहतर है 
साक्षात ब्रह्म से साक्षात्कार करना  

शनिवार, 20 जनवरी 2018

कहानी प्रेम की ...

तुम्हारा प्यार
जैसे पहाड़ों पे उतरी कुनमुनी धूप
झांकती तो थी मेरे आँगन  
पर मैं समझ न सका
वो प्यार की आंख-मिचोली है
या सुलगते सूरज से पिधलती सर्दियों की धूप

सर्दियों के दिन भी कितनी जल्दी ढल जाते हैं  
अभी पहाड़ी से निकले नहीं
की उतर गए देवदार की लंबी कतारों के पीछे

मौसम की सरसराहट के साथ धूप की तपिश जिस्म गरमाने लगी
जंगली गुलाब की झाड़ी मासूम कलियों से खिलने लगी
कायनात प्यार की खुशबू से महकने लगी

फिर अचानक वक़्त की करवट 
और बढ़ने लगे पहरे, हवाओं के  

तेज आंधी ने आसमान को अंधेरे की चादर तले ढक दिया
कई दिनों धूप मेरे आँगन नहीं उतरी

धीरे धीरे वक्त गुज़रा ...

सर्दियों के दिन फिर लौट के आने लगे
गुलाबी धूप भी पहाड़ों पे इतराने लगी 

पर कोने में लगी उस जंगली गुलाब की कांटे-दार झाड़ी में 
अब फूल खिलने बंद हो गए थे

सोचता हूँ प्रेम मौसम के साथ क्यों नहीं चलता ...   

सोमवार, 15 जनवरी 2018

समय ...

तपती रेत के टीलों से उठती आग
समुन्दर का गहरा नीला पानी
सांप सी बलखाती “शेख जायद रोड़”
कंक्रीट का इठलाता जंगल

सभी तो रोज नज़र आते थे रुके हुवे  
मेरे इतने करीब की मुझे लगा  
शायद वक़्त ठहरा हुवा है मेरे साथ   

ओर याद है वो “रिस्ट-वाच” 
“बुर्ज खलीफा” की बुलंदी पे तुमने उपहार में दी थी
कलाई में बंधने के बाजजूद
कभी बैटरी नहीं डली थी उसमें मैंने  
वक्त की सूइयां
रोक के रखना चाहता था मैं उन दिनों 

गाड़ियों की तेज रफ़्तार
सुबह से दोपहर शाम फिर रात का सिलसिला
हवा के रथ पे सवार आसमान की ओर जाते पंछी
कभी अच्छा नहीं लगा ये सब मुझे ...
वक्त के गुजरने का एहसास जो कराते थे

जबकि मैं लम्हों को सदियों में बदलना चाहता था
वक़्त को रोक देना चाहता था
तुम्हारे ओर मेरे बीच एक-टक
स्तब्ध, ग्रुत्वकर्षण मुक्त 
टिक टिक से परे, धडकन से इतर
एक लम्हा बुनना चाहता था

लम्हों को बाँध के रखने की इस जद्दोजेहद में 
उम्र भी कतरा कतरा पिघल गई 

फिर तुम भी तो साथ छोड़ गयीं थी ... 

शेख जायद रोड - दुबई की एक मशहूर सड़क
बुर्ज खलीफा - अभी तक की दुनिया में सबसे ऊंची इमारत दुबई की

बुधवार, 3 जनवरी 2018

उम्र के छलावे ...

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक मंगल कामनाएं ... २०१८ सबके लिए शुभ हो. नव वर्ष की शुरुआत एक रचना के साथ ... जाने क्यों अभी तक ब्लॉग पे नहीं डाली ... अगर आपके दिल को भी छू सके तो लिखना सार्थक होगा ...

तेरे चले जाने के बाद
पतझड़ की तरह कुछ पत्ते डाल से झड़ने लगे थे  
गमले में लगी तुलसी भी सूखने लगी थी
हालांकि वो आत्महत्या नहीं थी

वो तेरे स्पर्श का आभाव भी नही था   
क्योंकि समय के साथ कोने में पड़े कैक्टस पे फूल आने लगे थे
दावा तो नहीं कर सकता की वो खुशी के नहीं थे  

छत पे उतरी सीलन
जैसे कोरे कैनवस पे अजीबो-गरीब रेखाओं में बना तेरा अक्स  
जानता हूँ अगली बारिश से पहले छत की मरम्मत ज़रूरी है

ड्रैसिंग टेबल से सारी चीजें फिकवाने के बावजूद
नए रूम फ्रेशनर का कोई असर नहीं हो रहा
तेरे ब्रैंड के डीयो की खुशबू झड़ती है दिवारों से 
लगता है अगले साल घर की सफेदी भी करवानी होगी

पिछले कई दिनों से
बीते लम्हों की काई जमने लगी है फर्श पर 
टूटी टाइलों की झिर्रियों से यादों की बास उठने लगी है
लगता है अगली गर्मियों से पहले ये मार्बल भी बदलना होगा  

और इस खिड़की, रोशनदान का क्या करूं
पल्लों की ओट से लुका छिपी का खेल खेलते अब साँस फूलने लगी है 
तेरे होने का एहसास बार बार खिड़की के मुहाने ले आता है 
लगता है अगले साल तक इन्हें भी बंद करवाना होगा

और कोने में पड़ा आदम कद टैडी-बियर
वो भी पिछले कई दिनों से उदास है
तेरे चले जाने के बाद मैं उससे लिपट के सोने लगा था
अजीब सी जिस्मानी गंध रहती है उसमें
गहरे लाल लिपस्टिक के निशानों से अटा वो टैडी-बियर  
सोचता हूँ अबकी सर्दियों से पहले गरम कपड़ों के साथ
इसको भी ड्राई-क्लीन करवा लूँ

सच कहूं तो इतना कुछ है करने के लिए
समझ नहीं आता कहाँ से शुरुआत करूं ...
हाथ की लकीरों में उम्र की लकीर देख के हंसी आने लगी है अब
अपने आप से बातें करना सकून देने लगा है 

पता नहीं ये खुद से किये वादे हैं या जिंदगी के छलावे ...