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सोमवार, 4 दिसंबर 2017

कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने ...

लहू का रंग है यकसाँ कहा शमशीर भालों ने
लगा डाली है फिर भी आग बस्ती के दलालों ने 

यकीनन दूर है मंज़िल मगर मैं ढूंढ ही लूंगा
झलक दिखलाई है मुझको अँधेरे में उजालों ने

वो लड़की है तो माँ के पेट में क्या ख़त्म हो जाए 
झुका डाली मेरी गर्दन कुछ ऐसे ही सवालों ने

अलग धर्मों के भूखे नौजवानों का था कुछ झगड़ा
खबर दंगों की झूठी छाप दी अख़बार वालों ने

हवा भी साथ बेशर्मी से इनका दे रही है अब
शहर के हुक्म से जंगल जला डाला मशालों ने

वो अपना था पराया था वो क्या कुछ ले के भागा है 
कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने 

शुक्रवार, 1 मई 2015

मजदूर ...

रस्म निभाई के लिए एक दिन कुछ कर लेना क्या उस दिन का मज़ाक उड़ाना नहीं ... या कहीं ऐसा तो नहीं कम से कम एक दिन और हर साल उसी दिन को मनाना, अनसुलझे विषय को निरंतर जिन्दा रखने की जद्दोजहद हो ... जो भी हो काश ऐसी क्रांति आए की दिन मनाने की परंपरा ख़त्म हो सके समस्या के समाधान के साथ ...

वो अपने समय का
मशहूर मजदूर नेता था
आग उगलते नारों के चलते
कई बार अखबार की सुर्खियाँ बना

धुंआ उगलती चिमनियों के
नुक्कड़ वाले खोखे पे
रात उसकी लाश मिली

उसकी जागीर में थी
टूटी कलम
क्रांतिकारियों के कुछ पुराने चित्र
मजदूर शोषण पे लिखी
ढेर सारी रद्दी
पीले पड़ चुके पन्नों की कुछ किताबें
जो जोड़ी हवाई चप्पल
मैला कुचेला कुरता
और खून से लिखे विचार

आज एक बार फिर
वो शहर की अखबार में छपा

पर इस बार लावारिस लाश की
शिनाख्त वाले कॉलम में