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सोमवार, 23 जनवरी 2017

प्रश्न बेतुका सा ...

शोध कहाँ तक पहुँच गया है शायद सब को पता न हो ... हाँ मुझे तो बिलकुल ही नहीं पता ... इसलिए अनेकों  बेतुके सवाल कौंध जाते हैं ज़हन में ... ये भी तो एक सवाल ही है ...

सिलसिला कितना लंबा
खत्म होने का नाम नहीं

अमीरों के जूठे पत्तल पे झपटते इंसान
फिर कुत्ता-बिल्ली
पंछी
कीट-पतंगे
दीमक
बेक्टीरिया
वाइरस

क्या पता कुछ ओर भी
जो द्रध्य नहीं

आत्म-हत्या करना आसान नही   
कुलबुलाते पेट के साथ 
आत्म-हत्या की सोच से पहले  
भूख से जीतना होता है  

पर क्या
कुते बिल्ली, कीट पतंगे दीमक
की मानसिकता में भी ऐसा होता है  

ऐसा तो नहीं आत्म-हत्या
प्राणी-जगत के 
सबसे उन्नत जीव की उपज है ... ?

सोमवार, 8 जून 2015

अनकहे सच ...

हर प्रेम की इन्तहा मिलन तो नहीं ... फिसलन भरी राह कुछ पलों में जीवन गाथा से गुज़र जाती है पर बीते समय की हर गाथा सुहानी हो, जरूरी नहीं ... हर अतीत की याद मीठी हो, ये भी तो जरूरी नहीं ...

खुद की तलाश में
समय की काली पगडण्डी पर
इतना पीछे लौट गया की
बिखरी यादों के गोखरू पैरों को लहू-लुहान करने लगे
गुज़रे लम्हों के आवारा भूत ठेंगा दिखाने लगे

चुपके चुपके चलता बे-आवाज पदचापों का शोर
सीसा डालने के बावजूद बहरा करने लगा
जगह जगह बिखरे सपनों के अधजले कचरे सड़ांध मारने लगे
सांस लेने की मजबूरी में तेरी खुशबू लिपटी हवा
फेफड़ों को खोखला करने लगी

जीने मरने की कसमों के सियारी पद-चाप
विश्वास के जंगली कुत्तों की गुर्राहट

झपट्टा मारने को तैयार
प्रेम की खूनी इबारत से हांफती खूंखार बिल्लियाँ
दबे पाँव मुझको घेरने लगीं

चाँद की पीली रौशनी और तेरे बादली साए की धुंध के बीच
अनगिनत शक्लें बदलता समय
तेरे ही अक्स में तब्दील होने लगा

पलटी हुयी सफ़ेद आँखों की चुभन
काले बालों का बढ़ता जंगल
और नैपथ्य से आती विद्रूप हंसी की आवाजें
मुझे अपने आप से खींचने लगीं हैं

घुटन बढ़ने लगी है  ...

यकायक दूर से आती
फड़फड़ाते पन्नों की आवाज चुप हो जाती है
डायरी के पन्नों में इतिहास होता वर्तमान
साँस लेने लगता है