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बुधवार, 19 जुलाई 2017

यादें ... बस यादें

यादें यादें यादें ... क्या आना बंद होंगी ... काश की रूठ जाएँ यादें ... पर लगता तो नहीं और साँसों तक तो बिलकुल भी नहीं ... क्यों वक़्त जाया करना ...

मिट्टी की
कई परतों के बावजूद
हलके नहीं होते
कुछ यादों की निशान
हालांकि मूसलाधार बारिश के बाद
साफ़ हो जाता है आसमान

साफ़ हो जाती हैं
गर्द की पीली चादर ओढ़े
हरी हरी मासूम पत्तियां

साफ़ हो जाती हैं
उदास घरों की टीन वाली छतें

ओर ... ये काली सड़क भी
रुकी रहती है जो
तेरे लौटने के इंतज़ार में

इंतज़ार है जो ख़त्म नहीं होता
जंगली गुलाब है 
जो खिलता बंद नहीं करता   

मंगलवार, 7 जून 2016

बिन पिए ही रात बहकने लगी ...

ईंट ईंट घर की दरकने लगी
नीव खुद-ब-खुद ही सरकने लगी

बात जब बदलने लगी शोर में
छत दरो दिवार चटकने लगी

क्या हुआ बदलने लगा आज रुख
जलने से मशाल हिचकने लगी

बादलों को ले के उड़ी जब हवा
धूप बे-हिसाब दहकने लगी

दीप आँधियों में भी जलता रहा
रात को ये बात खटकने लगी

धर्म के गुज़रने लगे काफिले
गर्द फिर लहू से महकने लगी

सच की बारिशें जो पड़ीं झूम के
झूठ की ज़मीन सरकने लगी

बे-नकाब यूँ ही तुम्हे देख कर
बिन पिए ही रात बहकने लगी