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सोमवार, 13 अगस्त 2018

भीड़ जयचंदों की क्यों फिर देश से जाती नहीं है ...


सभी भारत वासियों को स्वतंत्रता दिवस, १५ अगस्त की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ ... एक छोटा सा आग्रह इस गीत के माध्यम से:  

हो गए टुकड़े अनेकों चेतना जागी नहीं है
क्या तपोवन में कहीं सिंह गर्जना बाकी नहीं है

था अतिथि देव भव का भाव अपना दिव्य चिंतन
पर सदा लुटते रहे इस बात पर हो घोर मंथन  
चिर विजय की कामना क्यों मन को महकाती नहीं है

संस्कृति के नाम पर कब तक हमें छलते रहेंगे
हम अहिंसा के पुजारी हैं तो क्या पिटते रहेंगे
क्या भरत भूमि अमर वीरों की परिपाटी नहीं है

खंड में बंटती रही माँ भारती लड़ते रहे हम
प्रांत भाषा वर्ण के झगड़ों में बस उलझे रहे हम
राष्ट्र की परिकल्पना क्यों सोच में आती नहीं है

सैनिकों के शौर्य को जब कायरों से तोलते हैं
नाम पर अभिव्यक्ति की हम शत्रु की जय बोलते हैं 
भीड़ जयचंदों की क्यों फिर देश से जाती नहीं है

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली ...


जाने किसने भेजी है पर मुझको तो बे-नाम मिली
आज सुबह दरवाज़ा खोला तो अख़बार के नीचे से
यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली

टूटी निब, पेन्सिल के टुकड़े, साइकिल की टूटी गद्दी
दागी कंचे, गोदे लट्टू, चरखी से लिपटी सद्दी
छुट्टी के दिन सुबह से लेकर रात तलक की कुछ बातें
बीते काल-खंड की छाया अनायास बे-दाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

दंगल, मेले, नौटंकी की खुशियों में डूबी बस्ती
हाथ से चलने वाले लकड़ी के झूलों की वो मस्ती
दद्दा के कंधे से देखी रावण की जलती हस्ती
दिल के गहरे तहखाने से जाने किसके नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

पीठ मिली जो पिट्ठू की गेंदों से सिक के लाल हुई
गिल्ली जो डंडे के हाथों पिट-पिट कर बेहाल हुई
छोटी बेरी के काँटों से दर्द में डूबी इक ऊँगली 
भूतों की आवाजों वाली इक कुटिया बदनाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

धूप मिली जो घर के आँगन में अकसर आ जाती थी
गाय मिली जो बासी रोटी छिलके सब खा जाती थी
वो कौवा जो छीन के रोटी हाथों से उड़ जाता था
फिर अतीत से उड़ कर मैना कोयल मेरे नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

कुछ अपनी जानी पहचानी अपनी ही आवाज़ मिली
ताल मिलाती मेज, तालियाँ, सपनों की परवाज़ मिली
टूटे शेर, अधूरी नज्में, आँखों में गुजरी रातें
फिर किताब के पीले पन्नों पर अटकी इक शाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

बुधवार, 3 जुलाई 2013

यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी ...

अपने मन की बातें तब तब बोलती थी    
यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी 

गीत पुरानी फिल्मों के जब गाती थी 
अल्हड बचपन में खुद को ले जाती थी 
कानों में जैसे शक्कर सा घोलती थी   
यादों की खिड़की ... 

मुश्किल न हो घर में उसके रहने से  
ठेस न लग जाए उसके कुछ कहने से  
कहने से पहले बातों को तोलती थी  
यादों की खिड़की ... 

नब्बे के दद्दा थे, बापू सत्तर के  
लग जाती थी चोट, फर्श थे पत्थर के     
साठ की अम्मा पर घूंघट में डोलती थी   
यादों की खिड़की ...