चाहत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चाहत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

चाहत उम्मीद की ...

सोचता हूँ फज़ूल है उम्मीद की चाह रखना ... कई बार गहरा दर्द दे जाती हैं ... टुकड़ा टुकड़ा मौत से अच्छा है  खुदकशी कर लेना ...

कुछ आहटें आती है उम्मीद की उस रास्ते से
छोड़ आए थे सपनों के सतरंगी ढेर जहां   
आशाओं के रेशमी पाँव रहने दो पालने में
की ज़मीन नहीं मिल पायगी तुम्हारी दहलीज़ की 
लटके रहेंगे हवा में
लटका रहता है खुले आसमान तले जैसे चाँद  

मत देना सांस उम्मीद को  
छोटी पड़ जाती है उम्र की पगडण्डी   
ओर बंद नहीं होता डाली पे फूल खिलना 
फज़ूल जाती हैं पतझड़ की तमाम कोशिशें
बारहा लहलहाते हैं उम्मीद के पत्ते

छुपा लेना उंगली का वो सिरा
झिलमिलाती है जहां से बर्क उम्मीद की   
आँखें पी लेती हैं तरंगें शराब की तरह  
नशा है जो उम्र भर नहीं उतरता

मत छोड़ना नमी जलती आग के गिर्द
भाप बनने से पहले ले लेते हैं पनाह उम्मीद के लपकते शोले
मजबूत होती रहती हैं जड़ें उम्मीद की  

हालांकि खोद डाली है गहरी खाई उस रास्ते के इस ओर मैंने
जहां से होकर आता है लाव-लश्कर उम्मीद का
पर क्या करूं इस दिल का  
जो छोड़ना नहीं चाहता दामन उम्मीद का ...  

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

चाहत ...

कहाँ खिलते हैं फूल रेगिस्तान में ... हालांकि पेड़ हैं जो जीते हैं बरसों बरसों नमी की इंतज़ार में ... धूल है की साथ छोड़ती नहीं ... नमी है की पास आती नहीं ... कहने को रेतीला सागर साथ है ...

मैंने चाहा तेरा हर दर्द
अपनी रेत के गहरे समुन्दर में लीलना

तपती धूप के रेगिस्तान में मैंने कोशिश की
धूल के साथ उड़ कर
तुझे छूने का प्रयास किया

पर काले बादल की कोख में
बेरंग आंसू छुपाए
बिन बरसे तुम गुजर गईं  

आज मरुस्थल का वो फूल भी मुरझा गया
जी रहा था जो तेरी नमी की प्रतीक्षा में

कहाँ होता है चाहत पे किसी का बस ...

सोमवार, 26 जनवरी 2015

चाहत जीने की

बेतरतीब लम्हों की चुभन मजा देती है ... महीन कांटें अन्दर तक गढ़े हों तो उनका मीठा मीठा दर्द भी मजा देने लगता है ... एहसास शब्दों के अर्थ बदलते हैं या शब्द ले जाते हैं गहरे तक पर प्रेम हो तो जैसे सब कुछ माया ... फूटे हैं कुछ लम्हों के बीज अभी अभी ...

टूट तो गया था कभी का
पर जागना नहीं चाहता तिलिस्मी ख्वाब से
गहरे दर्द के बाद मिलने वाले सकून का वक़्त अभी आया नही था

लम्हों के जुगनू बेरहमी से मसल दिए
कि आवारा रात की हवस में उतर आती है तू
बिस्तर की सलवटों में जैसे बदनाम शायर की नज़्म
नहीं चाहता बेचैन कर देने वाले अलफ़ाज़
मजबूर कर देते हैं जो जंगली गुलाब को खिलने पर

महसूस कर सकूं बासी यादों की चुभन
चल रहा हूँ नंगे पाँव गुजरी हुयी उम्र की पगडण्डी पे
तुम और मैं ... बस दो किरदार
वापसी के इस रोलर कोस्टर पर फुर्सत के तमाम लम्हों के साथ

धुंए के साथ फेफड़ों में जबरन घुसने की जंग में
सिगरेट नहीं अब साँसें पीने लगा हूँ
खून का उबाल नशे की किक से बाहर नहीं आने दे रहा

काश कहीं से उधार मिल सके साँसें
बहुत देर तक जीना चाहता हूँ जंगली गुलाब की यादों में