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रविवार, 20 जुलाई 2014

हवा के हाथ से बदली गिरी है ...

लचकती डाल से इमली गिरी है
कहीं पे आज फिर बिजली गिरी है

वहाँ भवरों की हलचल है अभी तक
जहाँ कच्ची कली जंगली गिरी है

सितारों में तुम्हारा अक्स होगा
खनकती सी हंसी उजली गिरी है

उसे थामा हुआ था इश्क ने ही
किताबों से जो इक तितली गिरी है

शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

सियासत दान कब गिरते हैं देखो
गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

जो राधा हो गया वो जान पाया
कहाँ पे कृष्ण की मुरली गिरी है

लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
हवा के हाथ से बदली गिरी है