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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

मुझ को वो आज नाम से पहचान तो गया ...

इक उम्र लग गई है मगर मान तो गया
मुझ को वो आज नाम से पहचान तो गया

अब जो भी फैंसला हो वो मंज़ूर है मुझे
जिसको भी जानना था वो सच जान तो गया 

दीपक हूँ मैं जो बुझ न सकूंगा हवाओं से 
कोशिश तमाम कर के ये तूफ़ान तो गया

बिल्डर की पड़ गई है नज़र रब भली करे
बच्चों के खेलने का ये मैदान तो गया

टूटे हुए किवाड़ सभी खिड़कियाँ खुली
बिटिया के सब दहेज़ का सामान तो गया
 
कर के हलाल दो ही दिनों में मेरा बजट
अच्छा हुआ जो घर से ये मेहमान तो गया 
(तरही गज़ल)

मंगलवार, 24 मई 2016

पाना है आकाश जिन्हें फिर पाने दो ...

भूख लगी है दो रोटी तो खाने दो
कुछ पल को बस छाया है सुस्ताने दो

हाथ उठाया जब बापू ने गुस्से में
अम्मा बोली बच्चा है समझाने दो

बरगद का इक पेड़ है मेरे आँगन में
आंधी हो तूफ़ान उन्हें तो आने दो

अपनी मिट्टी उनको खींच के लाएगी
छोड़ के जाते हैं जो उनको जाने दो

काला बादल है फिर मेरे कब्ज़े में
सूखे खेतों में पानी बरसाने दो

कागज़ के जो फूल उगाये रहते हैं
ऐसे पेड़ों को जड़ से मुरझाने दो

मुझको मेरी माँ का साया काफी है
पाना है आकाश जिन्हें फिर पाने दो

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

वो इक हादसा भूलना चाहता हूँ ...

समय को वहीं रोकना चाहता हूँ
में बचपन में फिर लौटना चाहता हूँ

में दीपक हूँ मुझको खुले में ही रखना
में तूफ़ान से जूझना चाहता हूँ

कहो दुश्मनों से चलें चाल अपनी
में हर दाव अब खेलना चाहता हूँ

में पतझड़ में पत्तों को खुद तोड़ दूंगा
हवा को यही बोलना चाहता हूँ

हवाओं की मस्ती, है कागज़ की कश्ती
में रुख देख कर मोड़ना चाहता हूँ

तुझे मिल के मैं जिंदगी से मिला पर
वो इक हादसा भूलना चाहता हूँ