दर्द लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दर्द लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 14 मार्च 2017

दर्द ...

अपना अपना अनुभव है जीवन ... कभी कठोर कभी कोमल, कभी ख़ुशी तो कभी दर्द ... हालांकि हर पहलू अपना निशान छोड़ता है जीवन में ... पर कई लम्हे गहरा घाव दे जाते हैं ... बातें करना आसान होता है बस ...

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है
आंसू निकल आएं तो मन हल्का होता है
पत्थर सा जमा
कुछ टूट कर पिघल जाता है

पर सच कहूँ ...

दर्द इंसान को ख़ुदग़र्ज़ बना देता है
सहलाने वाले हाथों पर फफोले उगा देता है
सहते सहते संवेदनहीन बना देता है   

बहते हुवे आंसू
पानी नहीं दर्द का सागर होते हैं
ऐसी आग जो पूरे शरीर को झुलसा देती है   

किसी की यादों का सैलाब जो रिस्ता है धीरे धीरे  
और उजाड देता हैं सपनों को चिंदी-चिंदी

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है ...

रविवार, 13 सितंबर 2015

इंसान बन के रह सकूं तो इत्मीनान हो ...

मैं सो सकूं मौला मुझे इतनी थकान हो
आकाश को छूती हुई चाहे उड़ान हो

सुख दुःख सफ़र में बांटना आसान हो सके
मैं चाहता हूँ मील के पत्थर में जान हो

है दर्द जो साझा तो मिल के सब ही बोल दें
मैं चाहता हूँ हाथ में सब के कमान हो

जब मौत का दिन तय नहीं तो हार किस लिए
जब तक रहे इंसान उसका दिल जवान हो

सुख चैन हो, कुछ कहकहे, थोड़ा सुकून भी
हर शहर के बाज़ार में ऐसी दुकान हो

इस दौर के उन्माद को रोकूंगा किस तरह
इंसान बन के रह सकूं तो इत्मीनान हो   

सोमवार, 26 जनवरी 2015

चाहत जीने की

बेतरतीब लम्हों की चुभन मजा देती है ... महीन कांटें अन्दर तक गढ़े हों तो उनका मीठा मीठा दर्द भी मजा देने लगता है ... एहसास शब्दों के अर्थ बदलते हैं या शब्द ले जाते हैं गहरे तक पर प्रेम हो तो जैसे सब कुछ माया ... फूटे हैं कुछ लम्हों के बीज अभी अभी ...

टूट तो गया था कभी का
पर जागना नहीं चाहता तिलिस्मी ख्वाब से
गहरे दर्द के बाद मिलने वाले सकून का वक़्त अभी आया नही था

लम्हों के जुगनू बेरहमी से मसल दिए
कि आवारा रात की हवस में उतर आती है तू
बिस्तर की सलवटों में जैसे बदनाम शायर की नज़्म
नहीं चाहता बेचैन कर देने वाले अलफ़ाज़
मजबूर कर देते हैं जो जंगली गुलाब को खिलने पर

महसूस कर सकूं बासी यादों की चुभन
चल रहा हूँ नंगे पाँव गुजरी हुयी उम्र की पगडण्डी पे
तुम और मैं ... बस दो किरदार
वापसी के इस रोलर कोस्टर पर फुर्सत के तमाम लम्हों के साथ

धुंए के साथ फेफड़ों में जबरन घुसने की जंग में
सिगरेट नहीं अब साँसें पीने लगा हूँ
खून का उबाल नशे की किक से बाहर नहीं आने दे रहा

काश कहीं से उधार मिल सके साँसें
बहुत देर तक जीना चाहता हूँ जंगली गुलाब की यादों में


सोमवार, 19 जनवरी 2015

क्या सच में कोई है

ज़िन्दगी जो न दिखाए वो कम है ... आस पास बिखरे माहोल से जुड़ा हर पल कालिख की तरफ धकेला जा रहा है ... और धकेलने वाला भी कौन ... इंसान, और वो भी इंसानियत के नाम पर ... पट्टी तो किसी ने नहीं बाँधी आँख पर, फिर भी इंसान है की उसे नज़र नहीं आता ... शायद देखना नहीं चाहता ...

पूछता हूँ देह से परे हर देह से
कि कह सके कोई आँखों से आँखें मिला कर
नहीं जागा शैतान मेरे अन्दर
फिर चाहे काबू पा लिया हो उस पर

चाहता हूँ पूछना जानवर से
जानवर होने की प्रवृति क्या आम है उनमें
या जरूरी है इंसान होना इस काबलियत के लिए

यही सवाल पंछी, कीट पतंगों पेड़ पौधों से भी करता हूँ

कुछ काँटों ने कहा हम नहीं दर्द के व्योपारी
शैतान तो देखा नहीं पर आम चर्चा है कायनात में
है कोई शैतान के नाम से इंसान जैसा
बांटता फिरता है हर दर्द

सुनते हैं इंसान से ऊपर भी रहती है कोई शख्सियत
जिसका प्रचलित नाम खुदा है ... हालांकि लगता नहीं

वैसे तो जंगली गुलाब भी खूब खिलता है यादों में
पर दीखता तो नहीं ...