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सोमवार, 20 नवंबर 2017

हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे ...

हम बुज़ुर्गों के चरणों में झुकते रहे
पद प्रतिष्ठा के संजोग बनते रहे

वो समुंदर में डूबेंगे हर हाल में 
नाव कागज़ की ले के जो चलते रहे

इसलिए बढ़ गईं उनकी बदमाशियाँ
हम गुनाहों को बच्चों के ढकते रहे

आश्की और फकीरी खुदा का करम
डूब कर ज़िन्दगी में उभरते रहे

धूप बारिश हवा सब से महरूम हैं
फूल घर के ही अंदर जो खिलते रहे

साल के दो दिनों को मुक़र्रर किया
देश भक्ति के गीतों को सुनते रहे

दोस्तों की दुआओं में कुछ था असर 
हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे

सोमवार, 14 अगस्त 2017

सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे ...

सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ-कामनाएं ... इस पावन पर्व की पूर्व संध्या पर आज के हालात पे लिखी गज़ल प्रस्तुत है ... आशा है सबका स्नेह मिलता रहेगा ...

जब तलक नापाक हरकत शत्रु की सहते रहेंगे
देश की सीमाओं पर सैनिक सदा मरते रहेंगे

पत्थरों से वार कर उक्सा रहे हैं देश-द्रोही
और कब तक हम अहिंसा मार्ग पर चलते रहंगे

मानता हूँ सिर के बदले सिर नहीं क़ानून अपना 
पर नहीं स्वीकार अपने वीर यूँ कटते रहेंगे

दक्ष हो कर आज फिर प्रतिशोध तो लेना पड़ेगा
सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे

एक ही आघात में अब क्यों नहीं कर दें बराबर 
शांति चर्चा, वार्ताएं बाद में करते रहेंगे