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रविवार, 26 जुलाई 2015

चुभते हैं इस कदर से तेरी याद के नश्तर ...

जो लोग आज खून मिटाने नहीं देते
रस्ता वही तो मिल के बनाने नहीं देते

कुछ लोग जो गुनाह की खेती के हैं माहिर
इंसानियत की फसल उगाने नहीं देते

जागीर आसमां को समझने लगे अपनी
परवाज़ पंछियों को लगाने नहीं देते

करते हैं सच के साथ की तो पैरवी अक्सर
पर आईने को सच भी दिखाने नहीं देते

खुद दोस्ती की आड़ में हैं घौंपते खंजर
पर दुश्मनों से हाथ मिलाने नहीं देते

जो तीरगी की कैद में रहने के हैं आदी
घर जुगनुओं को रात में आने नहीं देते

चुभते हैं इस कदर से तेरी याद के नश्तर
नाकाम दौरे-इश्क भुलाने नहीं देते