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सोमवार, 29 अगस्त 2016

एक टुकड़ा धूप का ले आऊंगा ...

एक टुकड़ा धूप का ले आऊंगा
जब कभी सूरज से मैं टकराऊंगा

"सत्य" सच है जान कर जाना नहीं
दूसरों को किस कदर समझाऊंगा

जब खुला आकाश देखूंगा कभी
पंख अपने खोल कर उड़ जाऊँगा

प्लास्टिक के फूल का जुमला सुनो
",मैं प्रदूषण से नहीं मुरझाऊंगा"

दूर थे फिर वोट नेता ने कहा
राग दीपक वक़्त पर ही गाऊंगा

कहकहे भी ऐश भी थी मुफ्त में
जेब में मैं कहकहे भर लाऊंगा

मंगलवार, 7 जून 2016

बिन पिए ही रात बहकने लगी ...

ईंट ईंट घर की दरकने लगी
नीव खुद-ब-खुद ही सरकने लगी

बात जब बदलने लगी शोर में
छत दरो दिवार चटकने लगी

क्या हुआ बदलने लगा आज रुख
जलने से मशाल हिचकने लगी

बादलों को ले के उड़ी जब हवा
धूप बे-हिसाब दहकने लगी

दीप आँधियों में भी जलता रहा
रात को ये बात खटकने लगी

धर्म के गुज़रने लगे काफिले
गर्द फिर लहू से महकने लगी

सच की बारिशें जो पड़ीं झूम के
झूठ की ज़मीन सरकने लगी

बे-नकाब यूँ ही तुम्हे देख कर
बिन पिए ही रात बहकने लगी