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रविवार, 12 अप्रैल 2015

शब्दों के नए अर्थ ...

कितना अच्छा है ख़्वाबों में रहना ... अपनी बनाई दुनिया जहाँ हर कोई हो बस मोहरा ... मन चाहा करवा लिया ... जब चाह बदल दिया ... उठा दिया, सुला लिया ... जो सोचा हूबहू वैसा ही हुआ ...

चलो मिल कर
शब्दों को दें नए अर्थ, नए नाम
क्रांति की बातों में कायरता का एहसास हो
विप्लव के स्वरों में रुदन का गान

दोस्ती के मायने दुश्मनी
(गलत है पर सच है)
प्यार के अर्थ में बेवफाई की बू आए
(पर ये हो शुरूआती मतलब ...
अंत तक तो प्यार वैसे भी बेवफाई में बदल जाता है)

फूल का कहें पत्ता
पत्ते को काँटा और काँटे का नाम फूल
(शायद ये ठीक नहीं ...  दोनों एक सा ही चुभते हैं)

भुखमरी, गरीबी, जहर, बीमारी
मजदूर, जनता, भिखारी
सब को बना दें पर्यायवाची शब्द
(मतलब एक सा जो है)

भ्रष्टाचार को ईमानदार
(नहीं नहीं ... शब्दों के अर्थों में कुछ फर्क तो होना चाहिए)

नेता को मदारी
(वो तो अब भी है)
नहीं तो सांप, नहीं तो लोमड़ी
(ये भी मिलते जुलते शब्द हैं)
तो चलो भगवान
(वो तो अब भी अपने आप को मानते हैं)
लगता है "नेता" शब्द को नए अर्थ देना आसान नहीं
(चलिए दुबारा लौटते हैं इसे नया अर्थ देने)

हाँ तो अगला शब्द ...

आम को करेला
और अन्य सभी फलों को भी करेले के समूह का फल
(इतने कडुवे जो हो गए हैं)

गेहूं दाल और सब्जियों को भी मिथक सा नाम दे दें
(किताबों में भी छोड़ने हैं कुछ शब्द)

सुबह को बोले रात और रात को भी रात
(गुम जो है "सुबह" अनगिनत जिंदगियों से)

धूप ...
अरे इसके तो बहुत से अर्थ मिल जायेंगे
जरा दिमाग के घोड़े दौडाएं

ऐसे ही अनगिनत शब्दों को मिल कर नए अर्थ दें
क्या पता जिंदगी बदले न बदले
कुछ मायने ही बदल जाएँ

हाँ ... अगर "बदल" शब्द के मायने नहीं बदले तो ...