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सोमवार, 1 मई 2017

मजदूर सच में ... या मजदूर दिवस ...

नीव का पहला पत्थर पर कितना ज़रूरी ... क्यों नहीं होता उसका नाम ... निर्माण का सतत साक्षी होने के बावजूद भी वो नहीं होता कहीं ... वर्ग जो दब के रह जाता है अपने सृजन के सौंदर्य में ...     

लहू सिंचित हाथों से
प्रखर तीरों का निर्माण करने वाले

इतिहास की छाती पे
क्रान्ति गान लिखने वाले 

सागर की उश्रंखल लहरों से
परिवर्तन की धार निकालने वाले

कुछ सिरफिरे पागलों के निशान
इतिहास में नहीं मिलते
काल खंड की गणना में उनका नाम नहीं होता
लोक गीतों की बोलियां
उनके साहस से नहीं गूंजती  

हां उनके पसीने की गंध उठती है
मिट्टी की सोंधी महक बन कर
झलकता है उनका अदृश्य सौन्दर्य
सृजन के आभा-मंडल में 

आसमां में चमकते कुछ तारे बदलते रहते हैं अपनी दिशा
जबकि निर्माण की सतत प्रक्रिया के साक्षी होते हैं वो   

और हाँ ... उन तारों का भी कोई नाम नहीं होता 
जैसे मजदूर ...

रविवार, 5 अप्रैल 2015

विचार ...

तपस्या जरूरी है सृजन के लिए और क्रांति के लिए ... विचार ... एक ऐसा विचार जो लेता रहे सांस दिल के किसी कोने में ... सतत सुलगने की आकांक्षा लिए ... आग जैसे धधकने की चाहत लिए ... महामारी सा फ़ैल जाने की उन्माद लिए ...

उधार के शब्दों से
विप्लव नहीं आता
परिवर्तन की लहर
आग के दरिया से उठनी जरूरी है

कुंद विचार
दासता की बेड़ी नहीं काट पाते
चासनी में डूबी लेखनी
गहरे अर्थ नहीं लिख पाती

क्रांति लिखने को
जरूरी है स्याही का लाल होना
कलम का तलवार होना
कागज़ के बदले
सख्त सीने की चट्टान होना

तब कहीं जाकर धरती की कोख से
अंगार के बीज पनपते हैं

निर्माण की प्रक्रिया
प्रसव पीड़ा से कम नहीं