नज़्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नज़्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 16 जनवरी 2017

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...

अजीब है ये सिलसिला ... चाहता हूँ पढ़ो पर कहता हूँ मत पढ़ो ... चाहता हूँ की वो सब करो जो नहीं कर सका ... कायर हूँ ... डरपोक हूँ या शायद ... (कवी का तमगा लगाते हुए तो शर्म आती है) ...    

मत पढ़ो मेरी नज़्म

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आग उगलते शब्दों से चुनी
बदनाम गलियों के सस्ते कमरे में बुनी
ज़ुल्म के तंदूर में भुनी  
चिपक न जाएं कहीं आत्मा पर
जाग न जाए कहीं ज़मीर

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आवारा है पूनम की लहरों सी 
बेशर्म सावन के बादल सी
जंगली खयालों में पनपी
सभ्यता से परे
उतार न दे कहीं झूठे आवरण

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
उनकी लटों में उलझी हुई
ज़माने से बे-खबर सोई हुई 
बोझिल पलकों से ढलक न जाए
छूते ही गालों को दहक न जाए
बे-सुध न हो तनमन 

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...

सोमवार, 26 जनवरी 2015

चाहत जीने की

बेतरतीब लम्हों की चुभन मजा देती है ... महीन कांटें अन्दर तक गढ़े हों तो उनका मीठा मीठा दर्द भी मजा देने लगता है ... एहसास शब्दों के अर्थ बदलते हैं या शब्द ले जाते हैं गहरे तक पर प्रेम हो तो जैसे सब कुछ माया ... फूटे हैं कुछ लम्हों के बीज अभी अभी ...

टूट तो गया था कभी का
पर जागना नहीं चाहता तिलिस्मी ख्वाब से
गहरे दर्द के बाद मिलने वाले सकून का वक़्त अभी आया नही था

लम्हों के जुगनू बेरहमी से मसल दिए
कि आवारा रात की हवस में उतर आती है तू
बिस्तर की सलवटों में जैसे बदनाम शायर की नज़्म
नहीं चाहता बेचैन कर देने वाले अलफ़ाज़
मजबूर कर देते हैं जो जंगली गुलाब को खिलने पर

महसूस कर सकूं बासी यादों की चुभन
चल रहा हूँ नंगे पाँव गुजरी हुयी उम्र की पगडण्डी पे
तुम और मैं ... बस दो किरदार
वापसी के इस रोलर कोस्टर पर फुर्सत के तमाम लम्हों के साथ

धुंए के साथ फेफड़ों में जबरन घुसने की जंग में
सिगरेट नहीं अब साँसें पीने लगा हूँ
खून का उबाल नशे की किक से बाहर नहीं आने दे रहा

काश कहीं से उधार मिल सके साँसें
बहुत देर तक जीना चाहता हूँ जंगली गुलाब की यादों में