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सोमवार, 5 सितंबर 2016

हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों ...

उग रहे बारूद खन्जर इन दिनों
हो गए हैं खेत बन्जर इन दिनों

चौकसी करती हैं मेरी कश्तियाँ
हद में रहता है समुन्दर इन दिनों

आस्तीनों में छुपे रहते हैं सब
लोग हैं कितने धुरन्धर इन दिनों

आदतें इन्सान की बदली हुईं
शहर में रहते हैं बन्दर इन दिनों

आ गए पत्थर सभी के हाथ में
हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों

रविवार, 12 जुलाई 2015

सोच लो ताज हो न ये सर का ...

रास्ता जब तलाशने निकले
खुद के क़दमों को नापने निकले

रोक लेते जो रोकना होता
हम तो थे सब के सामने निकले

जिंदगी दांव पे लगा डाली
इश्क में हम भी हारने निकले

कब से पसरा हुआ है सन्नाटा
चीख तो कोई मारने निकले

चाँद उतरा है झील में देखो
लोग पत्थर उछालने निकले

सोच लो ताज हो न ये सर का
तुम जो बोझा उतारने निकले