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गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते ...

अपने असूलों को कभी छोड़ा नहीं करते
साँसों की ख़ातिर लोग हर सौदा नहीं करते

महफूज़ जिनके दम पे है धरती हवा पानी
हैं तो ख़ुदा होने का पर दावा नहीं करते

हर मोड़ पर मुड़ने से पहले सोचना इतना
कुछ रास्ते जाते हैं बस लौटा नहीं करते

इतिहास की परछाइयों में डूब जाते हैं
गुज़रे हुए पन्नों से जो सीखा नहीं करते

आकाश तो उनका भी है जितना हमारा है
उड़ते परिंदों को कभी रोका नहीं करते

जो हो गया सो हो गया खुद का किया था सब
अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते
  

मंगलवार, 31 मई 2016

ये न समझो इसका मतलब सर झुकाना हो गया ...

जब से ये फुटपाथ रहने का ठिकाना हो गया
बारिशों में भीगने का इक बहाना हो गया

ख़त कभी पुर्ज़ा कभी कोने में बतियाते रहे
हमने बोला कान में तो फुसफुसाना हो गया

हम कहेंगे कुछ तो कहने का हुनर आता नहीं
जग सुनाएगा तो कह देंगे फ़साना हो गया

सीख लो अंदाज़ जीने का परिंदों से ज़रा
मिल गया दो वक़्त का तो चहचहाना हो गया

जिंदगी की कशमकश में इस कदर मसरूफ हूँ
खुद से ही बातें किए अब तो ज़माना हो गया

आपकी इज्ज़त के चलते हो गए खामोश हम
ये न समझो इसका मतलब सर झुकाना हो गया  

सोमवार, 2 मार्च 2015

ज़िंदगी का सेल्युलाइड ...

उम्र उतरती है इंसान पर, उसके चेहरे, उसके बालों पर, उसके जिस्म पर ... पर चाह कर भी नहीं उतर पाती यादों में बसी तुम्हारी तस्वीर पर, अतीत में बिखरे लम्हों पर ... मुद्दत बाद भी बूढी नहीं हो तुम बंद आँखों के पीछे ... ये इश्क है, रुका हुआ समय या माया प्रेम रचने वाले की ...

ठीक उसी समय
जब चूम रही होती हो तुम
जंगली गुलाब का फूल
चहचहाते हैं दो परिंदे पीपल की सबसे ऊंची डाल पे
रात भी रोक लेती है शाम का आँचल
पिघलने लगता है सूरज
समुन्दर की आगोश में

ठीक उसी समय
तकिये को बाहों में दबाए
मैं भी मूँद लेता हूँ अपनी आँखें
बज उठती है ठिठकी हुई पाज़ेब कायनात की
बहने लगती है हवा फिजाओं में

"ज़िंदगी के सेल्युलाइड में कैद कुछ लम्हे
कभी पुराने नहीं होते"