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मंगलवार, 22 मई 2018

दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी ...


दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी
लौट के इस शहर आओ साब जी

कश पे कश छल्लों पे छल्ले उफ़ वो दिन
विल्स की सिगरेट पिलाओ साब जी

मैस की पतली दाल रोटी, पेट फुल
पान कलकत्ति खिलाओ साब जी

मेज मैं फिर से बजाता हूँ चलो
तुम रफ़ी के गीत गाओ साब जी

क्यों न मिल के छत पे बचपन ढूंढ लें
कुछ पतंगें तुम उडाओ साब जी

लिख तो ली थी पर सुना न पाए थे
वो ग़ज़ल तो गुनगुनाओ साब जी

तब नहीं झिझके तो अब क्या हो गया
रेत से सीपी उठाओ साब जी

याद है ठर्रे के बोतल, उल्टियां
फिर से वो किस्सा सुनाओ साब जी

सीप, रम्मी, तीन पत्ती, रात भर 
फिर से गंडोला खिलाओ साब जी

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

ख़ामोशी ... एक एहसास

क्या बोलते रहना ही संवाद है ... शब्द ही एकमात्र माध्यम है अपनी बात को दुसरे तक पहुंचाने का ... तो क्या शब्द की उत्पत्ति मनुष्य के साथ से ही है ... अगर हाँ तो फिर ख़ामोशी ...

ख़ामोशी टुकड़ा नहीं
मुंह में डाला स्वाद ले लिया

ख़ामोशी पान भी नही चबाते रहे अंदर अंदर
जब चाहा थूक दिया कोरी दीवार पर
अपने होने का एहसास दिखाने के लिए

लड़ते रहना होता है अपने आप से निरंतर  
दबानी पड़ती है दिल की कशमकश
रोकना होता है आँखों का आइना
बोलता रहता है जो निरंतर
तब कहीं जा कर ख़ामोशी बनाती है अपनी जगह  
पाती है नया आकार
बन पाती है खुद अपनी ज़ुबान  

हाँ ... तब ही पहुँच पाती है अपने मुकाम पर
जहाँ दो इंच का फांसला तय करने में गुज़र जाए पूरी उम्र  

ख़ामोशी चीख है सन्नाटे में
जो आती है दबे पाँव कर जाती है बहरा हमेशा के लिए  

ख़ामोशी सच में कोई टुकड़ा नहीं ...