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रविवार, 2 अगस्त 2015

ज़िन्दगी यूँ ही बसर होती रहे ...

ज़िंदगी उनकी नजर होती रहे
खूबसूरत ये डगर होती रहे

सादगी इतनी है तेरे रूप में
बंदगी आठों पहर होती रहे

मैं उठूं तो हो मेरे पहलू में तू
रोज़ ही ऐसी सहर होती रहे

डूबना मंज़ूर है इस शर्त पे
प्यार की बारिश अगर होती रहे

तेज़ तीखी धूप लेता हूँ मगर
छाँव पेड़ों की उधर होती रहे

मुद्दतों के बाद तू है रूबरू
गुफ्तगू ये रात भर होती रहे

माँ का साया हो सदा सर पर मेरे
ज़िन्दगी यूँ ही बसर होती रहे



मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये ...

खिलखिलाती हुई तू मिली है प्रिये
उम्र भर रुत सुहानी रही है प्रिये

आसमानी दुपट्टा झुकी सी नज़र
इस मिलन की कहानी यही है प्रिये

कौन से गुल खिले, रात भर क्या हुआ
सिलवटों ने कहानी कही है प्रिये

तोलिये से है बालों को झटका जहाँ
ये हवा उस तरफ से बही है प्रिये

ये दबी सी हंसी चूड़ियों की खनक
घर के कण कण में तेरी छवी है प्रिये

जब भी आँगन में चूल्हा जलाती है तू
मुझको देवी सी हरदम लगी है प्रिये

बाज़ुओं में मेरी थक के सोई है तू
पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये

(पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर तरही मुशायरे में लिखी एक ग़ज़ल)