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रविवार, 10 अगस्त 2014

बस छोड़ कर बदलाव के सब कुछ बदलता है ...

जम कर पसीना बाजुओं से जब निकलता है
मुश्किल से तब जाकर कहीं ये फूल खिलता है

ये बात सच है तुम इसे मानो के ना मानो
बस छोड़ कर बदलाव के सब कुछ बदलता है

कुछ हौंसला, अरमान कुछ, कुछ ख्वाहिशें दिल की
तूफ़ान में यूँ ही नहीं तो दीप जलता है

ये थी शरारात, दिल्लगी या इश्क़ जो भी हो
बस ख्वाब उनका ही मेरी आँखों में पलता है

दिन भर की अपनी आग, अपनी तिश्नगी लेकर
तपता हुआ सूरज समुंदर में पिघलता है