बातें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बातें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 5 जनवरी 2015

कभी भी ... कुछ भी ...

गौर से देखा मैंने चाँद , फिर तारे, फिर तुम्हें और फिर अपने आप को ... कुछ भी बदला हुआ नहीं लगा ... हवा, बादल, रेत, समुंदर, सडकें ... सब थे पर बदला हुआ कुछ भी नहीं था ... पर फिर भी था ... कुछ तो था पिछले दिनों ... हालांकि नया सा तो कुछ भी नहीं हुआ था पर सब लोग कह रहे थे नया साल आ गया ... क्या सचमुच ... और क्यों ...

वजह तो कुछ भी नहीं
पर अच्छा लगता था बातों के बीच अचानक तेरा रुक जाना
धीरे से मुस्कुराना
एक टक देखना फिर जोर से खिलखिलाना
मैं जानता था
वजह तो उसकी भी नहीं थी

पता होते हुए भी
कि तपते रेगिस्तान में नहीं आते मुसाफिर
खिलते हैं कैक्टस पे फूल पीले हो चुके काँटों के साथ
वजह तो उसकी भी नहीं होती

वजह तो सागर की छाती पे बरसती बरसात की भी नहीं होती
और ठक ठक गिरते ओलों की तो बिलकुल भी नहीं

तुम नहीं आओगी जैसे गुज़रा वक्त नहीं आता
टूटे ख्वाब आँखों में नहीं आते
फिर भी इंतज़ार है की बस रहता ही है
वजह तो कुछ भी नहीं

आस्था को तर्क पे तोलना
जंगली गुलाब में तेरा अक्स ढूंढना
वजह तो कुछ भी नहीं

वजह तो कुछ भी नहीं
नया साल भी हर साल आता है
बेइंतिहा तुम भी याद आती हो 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

समय ...

एक ही झटके में सिखा दीं वो तमाम बातें 
समय ने 
सीख नहीं सका, बालों में सफेदी आने के बावजूद 
उस पर मज़े की बात      
न कोई अध्यापक, न किताब, न रटने का सिलसिला 
जब तक समझ पाता, छप गया पूरा पाठ दिमाग में 
जिंदगी भर न भूलने के लिए   

सोचता था पा लूँगा हर वो चीज़ समय से लड़ के 
जो लेना चाहता हूं 
समय के आगे कभी नतमस्तक नहीं हुआ 
हालांकि तू हमेशा कहती रही समय की कद्र करने की ... 

सच तो ये है की सपने में भी नहीं सोच सका 
रह पाऊंगा तेरे बगेर एक भी दिन    
पर सिखा दिया समय ने, न सिर्फ जीना, बल्कि जीते भी रहना 
तेरे चले जाने के बाद भी इस दुनिया में 

तू अक्सर कहा करती थी वक़्त की मार का इलाज 
हकीम लुकमान के पास भी नहीं ...    
समय की करनी के आगे सर झुकाना पड़ता है ... 

सही कहती थी माँ 
समय के एक ही वार ने हर बात सिखा दी