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सोमवार, 18 सितंबर 2017

मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में ...

बारूद की खुशबू है, दिन रात हवाओं में
देता है कोई छुप कर, तकरीर सभाओं में

इक याद भटकती है, इक रूह सिसकती है
घुंघरू से खनकते हैं, खामोश गुफाओं में

बादल तो नहीं गरजे, बूँदें भी नहीं आईं
कितना है असर देखो, आशिक की दुआओं में

चीज़ों से रसोई की, अम्मा जो बनाती थी
देखा है असर उनका, देखा जो दवाओं में

हे राम चले आओ, उद्धार करो सब का
कितनी हैं अहिल्याएं, कल-युग की शिलाओं में

जीना तो तेरे दम पर, मरना तो तेरी खातिर 
मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में 

बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए ...

कुछ यूँ फिसल के वो मेरी बाहों में आ गए 
ना चाहते हुए भी निगाहों में आ गए

सच की तलाश थी में अकेला निकल पड़ा
जुड़ते रहे थे लोग जो राहों में आ गए 

हम भीगने को प्रेम की बरसात में सनम
कुछ देर बादलों की पनाहों में आ गए

था प्रेम उनसे उनके लगे झूठ सच सभी
ना चाह कर भी उनके गुनाहों में आ गए

मशहूर हो गया है हमारा भी नाम अब
हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए 

मंगलवार, 7 जून 2016

बिन पिए ही रात बहकने लगी ...

ईंट ईंट घर की दरकने लगी
नीव खुद-ब-खुद ही सरकने लगी

बात जब बदलने लगी शोर में
छत दरो दिवार चटकने लगी

क्या हुआ बदलने लगा आज रुख
जलने से मशाल हिचकने लगी

बादलों को ले के उड़ी जब हवा
धूप बे-हिसाब दहकने लगी

दीप आँधियों में भी जलता रहा
रात को ये बात खटकने लगी

धर्म के गुज़रने लगे काफिले
गर्द फिर लहू से महकने लगी

सच की बारिशें जो पड़ीं झूम के
झूठ की ज़मीन सरकने लगी

बे-नकाब यूँ ही तुम्हे देख कर
बिन पिए ही रात बहकने लगी


मंगलवार, 18 अगस्त 2015

धूप को वो छोड़ के घर आ गया ...

फोड़ के सभी का वो सर आ गया
उसमें पत्थरों का असर आ गया

बोल दो चिराग से छुप कर रहे
तेज़ आंधियों का शहर आ गया

छंट गए गुबार सभी धूल के
बादलों का झुण्ड जिधर आ गया

दुश्मनी रहेगी कभी भी नहीं
भूल जाने का जो हुनर आ गया

देखते न खुद के मुंहासे कभी
दूसरों का तिल भी नज़र  गया

जुगनुओं की एक झलक क्या मिली
धूप को वो छोड़ के घर आ गया

पिछले कई दिनों से घर से दूर एरिज़ोना, यूं. एस. में हूँ, आज समय मिलने पे आपसे मुखातिब हूँ, उम्मीद है जल्दी ही ब्लॉग पे नियमित होऊंगा

रविवार, 26 अप्रैल 2015

कुछ तस्वीरें ...

इंसान की खुद पे पाबंदी कभी कामयाब नहीं होती ... कभी कभी तो तोड़ने की जिद्द इतनी हावी हो जाती है की पता नहीं चलता कौन टूटा ... सपना, कांच या जिंदगी ... फुसरत के लम्हे आसानी से नही मिलते ... खुद से करने को ढेरों बातें  ... काश टूटने से पहले पूरी हो चाहत ...  

सिगरेट के धुंए से बनती तस्वीर
शक्ल मिलते ही
फूंक मार के तहस नहस

हालांकि आ चुकी होती हो तब तब
मेरे ज़ेहन में तुम

दागे हुए प्रश्नों का अंजाना डर
ताकत का गुमान की मैं भी मिटा सकता हूँ
या "सेडस्टिक प्लेज़र"

तस्वीर नहीं बनती तो भी बनता हूँ
(मिटानी जो है)

सच क्या है कुछ पता नहीं
पर मुझे बादल भी अच्छे नहीं लगते
शक्लें बनाते फिरते हैं आसमान में
कभी कभी तो जम ही जाते हैं एक जगह
एक ही तस्वीर बनाए
शरीर पे लगे गहरे घाव की तरह

फूंक मारते मारते अक्सर बेहाल हो जाता हूँ
सांस जब अटकने लगती है
कसम लेता हूँ बादलों को ना देखने की

पर कम्बख्त ये सिगरेट नहीं छूटेगी मुझसे ...