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सोमवार, 4 जून 2018

सुबह की चाय में बिस्कुट डुबा कर ...


नहीं जाता है ये इक बार आ कर
बुढ़ापा जाएगा साँसें छुड़ा कर

फकत इस बात पे सोई नहीं वो
अभी सो जायेगी मुझको सुला कर

तुम्हारे हाथ भी तो कांपते हैं
में रख देता हूँ ये बर्तन उठा कर

“शुगर” है गुड़ नहीं खाऊंगा जाना
न रक्खो यूँ मेरा “डेन्चर” छुपा कर

तुझे भी “वाइरल”, मैं भी पड़ा हूँ
दिखा आयें चलो “ओला” बुला कर

सुनो वो आसमानी शाल ले लो
निकल जाएँ कहीं सब कुछ भुला कर

सुबह उठना बहुत भारी है फिर भी
चलो योगा करें हम मुस्कुरा कर

असर इस उम्र का दोनों पे है अब
हैं ऐनक ढूंढते ऐनक लगा कर

मज़ा था तब जरूरी अब है खाना 
सुबह की चाय में बिस्कुट डुबा कर

बुधवार, 24 जून 2015

सोच ...

प्रेम में डूब जाना योगी हो जाना तो नहीं ... फिर जीवन से आगे किसने देखा ... अचानक एक छोटे से सुख का मिलना, फिर उस सुख को अपने ही आस-पास बनाये रखने की चाह बनाए रखना ... थोड़ा सा स्वार्थी होना बेमानी तो नहीं ...

क्योंकि ऊंचाई का सफ़र
तन्हाई के रास्ते से गुज़रता है
मैं यह नहीं कहूँगा
की तुम जीवन में नई ऊँचाइयाँ छुओ

मैंने तो अपनी उड़ान का दायरा
उसी दिन तय कर लिया था
जिस दिन तुम ज़िन्दगी में आईं

मैं यह भी नहीं कहूँगा
तुमको मेरी उम्र लग जाए

क्योंकि मेरी उम्र की सीमा तो तय है
तुम्हारी उम्र की तरह
और में जीना चाहता हूँ हर गुज़रता लम्हा
तेरे और बस तेरे ही साथ

हाँ मैं जानता हूँ
खुदगर्जी की पराकाष्ठा है ये
अपने से आगे नहीं सोच पाने का स्वार्थ

पर क्या करूं ये सोच ये सोच भी तो कमबख्त
तेरे पे आकर ही ख़त्म होती है