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सोमवार, 9 मार्च 2015

क्या है प्रेम का सच ...

पूछता हूँ अपने आप से ... क्या प्रेम रहा है हर वक़्त ... या इसके आवरण के पीछे छुपी रहती है शैतानी सोच  ... अन्दर बाहर एक बने रहने का नाटक करता इंसान, क्या थक कर अन्दर या बाहर के किसी एक सच को अंजाम दे पायेगा ... सुनो तुम अगर पढ़ रही हो तो इस बात को दिल से न लगाना ... सच तो तुम जानती ही हो ...

तुम्हें देख कर मुस्कुराता हूँ
जूड़े में पिन लगाती तुम कुछ गुनगुना रही हो

वर्तमान में रहते हुए
अतीत में उतर जाने की चाहत रोक नहीं पाता
हालांकि रखता हूँ अपनी चेतना
अतीत में उतरते हुए भी साथ

मेरे शैतान का ये सबसे अच्छा शुगल रहा है

चेहरे पर मुस्कान लिए "स्लो मोशन" में
आ जाता हूँ तुम्हारे इतना करीब
की टकराने लगते है
तुम्हारी गर्दन के नर्म रोये मेरी गर्म साँसों से

ठीक उसी समय
मूंद देता हूँ नशे के आलम में डूबी तुम्हारी दो आँखें
और गाढ़ देता हूँ जूड़े में लगा पिन चुपके से तुम्हारी गर्दन में

यक-ब-यक लम्बे होते दो दांतों की तन्द्रा तोड़ कर
लौट आता हूँ वर्तमान में

मसले हुए जंगली गुलाब की गाढ़ी लाली
चिपक जाती है उँगलियों में ताज़ा खून की खुशबू लिए

मैं अब भी मुस्कुरा रहा हूँ तुम्हे देख कर
जूड़े में पिन लगाती तुम भी कुछ गुनगुना रही हो 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

रंग ...

इंद्र-धनुष के सात रंगों में रंग नहीं होते ... रंग सूरज की किरणों में भी नहीं होते और आकाश के नीलेपन में तो बिलकुल भी नहीं ... रंग होते हैं देखने वाले की आँख में जो जागते हैं प्रेम के एहसास से ... किसी के साथ से ...

दुनिया रंगीन दिखे
इसलिए तो नहीं भर लेते रंग आँखों में

तन्हा रातों की कुछ उदास यादें
आंसू बन के न उतरें
तो खुद-बी-खुद रंगीन हो जाती है दुनिया

दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब हसीन लम्हों के द्रख्त
जड़ बनाने लगते हैं दिल की कोरी जमीन पर
क्योंकि उसके साए में उगे रंगीन सपने
जगमगाते हैं उम्र भर

सच पूछो तो दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब तेरे एहसास के कुछ कतरों के साथ
फूल फूल डोलती हैं तितलियाँ
और उनके पीछे भागते हैं कुछ मासूम बच्चे
रंग-बिरँगे कपड़ों में

पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी और आसमानी शाल ओढ़े
तुम भी तो करती हो चहल-कदमी रोज़ मेरे ज़ेहन में
दुनिया इसलिए भी तो रंगीन होती हैं

दुनिया इसलिए भी रंगीन होती है
की टांकती हो तुम जूड़े में जंगली गुलाब