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मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

ये अँधेरा भी छंटेगा धूप को आने तो दो
मुट्ठियों में आज खुशियाँ भर के घर लाने तो दो

खुद को हल्का कर सकोगे ज़िन्दगी के बोझ से
दर्द अपना आँसुओं के संग बह जाने तो दो

झूम के आता पवन देता निमंत्रण प्रेम का
छू सके जो मन-मयूरी गीत फिर गाने तो दो

बारिशों का रोक के कब तक रखोगे आगमन
खोल दो जुल्फें घटा सावन की अब छाने तो दो

सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

सोमवार, 25 जुलाई 2016

कह के जो कभी बात को झुठलाएँगे नहीं ...

टूटेंगे मगर फिर भी वो पछताएँगे नहीं
कह के जो कभी बात को झुठलाएँगे नहीं

रिश्तों का यही सच है इसे गाँठ बाँध लो
जो प्रेम से सींचोगे तो मुरझाएँगे नहीं

मुद्दत से धड़कता था ये दिल उन के वास्ते
उम्मीद यही है के वो ठुकराएँगे नहीं

उनके ही हो ये बात कभी दिल से बोल दो
दो नैन कभी आपसे शरमाएँगे नहीं

भाषा जो कभी प्रेम की तुम पढ़ सको पढ़ो
खुद से तो कभी प्रेम वो जतलाएँगे नहीं

जो दर्द का व्योपार ज़माने से कर रहे
ज़ख्मों को कभी आपके सहलाएँगे नहीं


मंगलवार, 1 सितंबर 2015

किसी की याद के मंज़र पिघल गए होंगे ...

किसी की आँख से आंसू निकल गए होंगे
मुसाफिरों के इरादे बदल गए होंगे

कहीं से फ़ैल गयी होगी बात आने की
तभी तो हाथ के कंगन मचल गए होंगे

किसी के ख्वाब में तस्वीर जो बनी होगी
किसी के याद के मंज़र पिघल गए होंगे

ये रौशनी का नहीं फलसफा है रिश्तों का
ढली जो रात सितारे भी ढल गए होंगे

ये सिलसिला तो यकीनन मनाएंगे मिल कर
शमा जली तो पतंगे भी जल गए होंगे

मेरे ही नाम को जपती हो रात दिन जाना
तुम्हारे चाहने वाले तो जल गए होंगे