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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

जिंदगी किताब और आखरी पन्ना ...

क्या सच में जीवन का अन्त नहीं ... क्या जीवन निरंतर है ... आत्मा के दृष्टिकोण से देखो तो शायद हाँ ... पर शरीर के माध्यम से देखो तो ... पर क्या दोनों का अस्तित्व है एक दुसरे के बिना ... छोड़ो गुणी जनों के समझ की बाते हैं अपने को क्या ...   

अचानक नहीं आता
ज़िंदगी की क़िताब का आखरी पन्ना
हां ... कभी कभी
कहानी का अन्त आ जाता है बीच में
कई बार उस अन्त से आगे जाने की इच्छा मर जाती है
पर जीवन चलता रहता है
थके हुए कछुए की रफ़्तार से

कहते हैं लकड़ी पे लगी दीमक
जितना जल्दी हो निकाल देनी चाहिए
और सच पूछो तो यादें भी
नहीं तो झड़ती हैं बुरादे की तरह साँसें ज़िन्दगी से   

अच्छा होता जो खाली रहती ज़िंदगी की किताब
कोरी ... श्वेत धवल अन्त तक

कम से कम आखरी पन्ने की तलाश 
आखरी पन्ने पे ख़त्म होती ...

मंगलवार, 14 जून 2016

कुछ गुनाहों की सजा मिलती नहीं ...

आँख में उम्मीद जो पलती नहीं
रात काली ढल के भी ढलती नहीं

भूख भी है प्यास भी कुछ और भी
प्रेम से बस जिंदगी चलती नहीं

हौंसला तो ठीक है लकड़ी भी हो
आग वरना देर तक जलती नहीं

इश्क तिकड़म से भरा वो खेल है
दाल जिसमें देर तक गलती नहीं

है कहाँ मुमकिन हमारे बस में फिर
ज़िंदगी में हो कभी गलती नहीं

डोर रिश्तों की न टूटे जान लो
गाँठ आसानी से फिर खुलती नहीं

है शिकायत रब से क्यों जीते हुए
कुछ गुनाहों की सजा मिलती नहीं