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रविवार, 31 मई 2015

सैडिस्टिक प्लेज़र ...

लड़ना, हारना, बदलना फिर लड़ना वो भी अपने आप से ... परास्त होते होते मजा आने लगता है अपनी हार पर, अपनी जुस्तजू पर ... कई बार जब संवेदना मर जाती है ये मजा शैतानी मजे में बदल जाता है पर फिर भी हारता तो खुद ही है इंसान ...

कई बार
चैहरे को खूँटी पे टांग
पैरों को दरवाजे पे उतार
देह से विदेह
स्वयं को देखने की कोशिश में
खो देता हूँ अपना अस्तित्व

हर बार
खाली कमजोर शरीर में
कलुषित विचार
अपना प्रभुत्व जमा लेते हैं
विचारों को कुंठित करने वाले जिवाणु
शब्दों का अपहरण कर
मनचाहा लिखवा लेते हैं

खुद को पाने की कोशिश में
"जो होना चाहता हूँ" का सौदा करता हूँ
"जो नहीं होना चाहता" का मुखौटा लगाता हूँ
फिर कई दिन
अंतर्द्वंद की विभीषिका में जीता हूँ

शब्दों की अग्नि सुलगते सुलगते
फिर कर देती है उद्वेलित
देह से विदेह हो
फिर स्वयं को देखता हूँ
कुछ और जीवाणुओं से लड़ता हूँ
परास्त होता हूँ
नया सौदा करता हूँ

हाँ ... सौदा करना नहीं छोड़ता
सैडिस्टिक प्लेज़र नाम की चीज़ भी तो होती है ...

  

रविवार, 12 अप्रैल 2015

शब्दों के नए अर्थ ...

कितना अच्छा है ख़्वाबों में रहना ... अपनी बनाई दुनिया जहाँ हर कोई हो बस मोहरा ... मन चाहा करवा लिया ... जब चाह बदल दिया ... उठा दिया, सुला लिया ... जो सोचा हूबहू वैसा ही हुआ ...

चलो मिल कर
शब्दों को दें नए अर्थ, नए नाम
क्रांति की बातों में कायरता का एहसास हो
विप्लव के स्वरों में रुदन का गान

दोस्ती के मायने दुश्मनी
(गलत है पर सच है)
प्यार के अर्थ में बेवफाई की बू आए
(पर ये हो शुरूआती मतलब ...
अंत तक तो प्यार वैसे भी बेवफाई में बदल जाता है)

फूल का कहें पत्ता
पत्ते को काँटा और काँटे का नाम फूल
(शायद ये ठीक नहीं ...  दोनों एक सा ही चुभते हैं)

भुखमरी, गरीबी, जहर, बीमारी
मजदूर, जनता, भिखारी
सब को बना दें पर्यायवाची शब्द
(मतलब एक सा जो है)

भ्रष्टाचार को ईमानदार
(नहीं नहीं ... शब्दों के अर्थों में कुछ फर्क तो होना चाहिए)

नेता को मदारी
(वो तो अब भी है)
नहीं तो सांप, नहीं तो लोमड़ी
(ये भी मिलते जुलते शब्द हैं)
तो चलो भगवान
(वो तो अब भी अपने आप को मानते हैं)
लगता है "नेता" शब्द को नए अर्थ देना आसान नहीं
(चलिए दुबारा लौटते हैं इसे नया अर्थ देने)

हाँ तो अगला शब्द ...

आम को करेला
और अन्य सभी फलों को भी करेले के समूह का फल
(इतने कडुवे जो हो गए हैं)

गेहूं दाल और सब्जियों को भी मिथक सा नाम दे दें
(किताबों में भी छोड़ने हैं कुछ शब्द)

सुबह को बोले रात और रात को भी रात
(गुम जो है "सुबह" अनगिनत जिंदगियों से)

धूप ...
अरे इसके तो बहुत से अर्थ मिल जायेंगे
जरा दिमाग के घोड़े दौडाएं

ऐसे ही अनगिनत शब्दों को मिल कर नए अर्थ दें
क्या पता जिंदगी बदले न बदले
कुछ मायने ही बदल जाएँ

हाँ ... अगर "बदल" शब्द के मायने नहीं बदले तो ...

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

कच्चे शब्द ...

कोशिश में लगी रहती है ये कायनात, तमाम प्रेम करने वालों को उस जगह धकेलने की ... जहां बदलता रहता है सब कुछ, सिवाए प्रेम के ... गिने-चुने से इन ज़र्रों में बस प्रेम ही होता है और होती है बंसी कि धुन ... इसकी राह में जाने वाला हर पथिक बस होता है कृष्ण या राधा और होती है एक धुन आलोकिक प्रेम की ...


समुन्दर के उस कोने पे
टुकड़े टुकड़े उतरता है जहां नीला आसमां
सूरज भी सो जाता है थक के
नीली लहरों कि आगोश में जहां

कायनात के उसी ज़र्रे पे
छोड़ आया हूँ कुछ कच्चे शब्द

पढ़ आना उन्हें फुर्सत के लम्हों में
ढाल आना उसी सांचे में
जो तुमको हो क़ुबूल

कि हमने तो कसम खाई है
हर हाल में तुम्हें पाने की ...
     

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

निर्धारित शब्द ...

अनगिनत शब्द जो आँखों से बोले जाते हैं, तैरते रहते हैं कायनात में ... अर्जुन की कमान से निकले तीर की तरह, तलाश रहती है इन लक्ष्य-प्रेरित शब्दों को निर्धारित चिड़िया की आँख की ... बदलते मौसम के बीच मेरे शब्द भी तो बेताब हैं तुझसे मिलने को ...

ठंडी हवा से गर्म लू के थपेडों तक
खुली रहती है मेरी खिड़की
कि बिखरे हुए सफ़ेद कोहरे के ताने बाने में
तो कभी उडती रेत के बदलते कैनवस पे
समुन्दर कि इठलाती लहरों में
तो कभी रात के गहरे आँचल में चमकते सितारों में
दिखाई दे वो चेहरा कभी
जिसके गुलाबी होठ के ठीक ऊपर
मुस्कुराता रहता है काला तिल

कोई समझे न समझे
जब मिलोगी इन शब्दों से तो समझ जाओगी

मैं अब भी खड़ा हूँ खुली खिडके के मुहाने
आँखों से बुनते अनगिनत शब्द ...