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सोमवार, 19 मार्च 2018

समय - एक इरेज़र ... ?


यादें यादें यादें ... क्यों आती हैं ... कब आती हैं ... कैसे आती हैं ... जरूरी है यादों की यादों में रहना ... या साँसों  का हिसाब रखना ... या फिर जंगली गुलाब का याद रखना ...

सांसों के सिवा
मुसलसल कुछ नहीं जिंदगी में
वैसे तिश्नगी भी मुसलसल होती है
जब तक तू नहीं होती

पतझड़ का आना बेसबब नहीं 
सूखे पत्तों के चटखने की आवाज़ से
कितनी मिलती जुलती है
तेरी हंसी की खनक  

यादें आएं इसलिए ज़रूरी है
किसी का चले जाना जिंदगी से
हालाँकि नहीं भरते समय की तुरपाई से
कुछ यादों के हल्के घाव भी

कोरे कैनवस में रंग भरने के लिए 
जैसे ज़रूरी है यादों का सहारा
उतना ही ज़रूरी है 
अपने आप से बातें करना

अज़ाब बन के आती हैं जंगली गुलाब की यादें 
समय वो इरेज़र नहीं जो मिटा सके ...

सोमवार, 15 जनवरी 2018

समय ...

तपती रेत के टीलों से उठती आग
समुन्दर का गहरा नीला पानी
सांप सी बलखाती “शेख जायद रोड़”
कंक्रीट का इठलाता जंगल

सभी तो रोज नज़र आते थे रुके हुवे  
मेरे इतने करीब की मुझे लगा  
शायद वक़्त ठहरा हुवा है मेरे साथ   

ओर याद है वो “रिस्ट-वाच” 
“बुर्ज खलीफा” की बुलंदी पे तुमने उपहार में दी थी
कलाई में बंधने के बाजजूद
कभी बैटरी नहीं डली थी उसमें मैंने  
वक्त की सूइयां
रोक के रखना चाहता था मैं उन दिनों 

गाड़ियों की तेज रफ़्तार
सुबह से दोपहर शाम फिर रात का सिलसिला
हवा के रथ पे सवार आसमान की ओर जाते पंछी
कभी अच्छा नहीं लगा ये सब मुझे ...
वक्त के गुजरने का एहसास जो कराते थे

जबकि मैं लम्हों को सदियों में बदलना चाहता था
वक़्त को रोक देना चाहता था
तुम्हारे ओर मेरे बीच एक-टक
स्तब्ध, ग्रुत्वकर्षण मुक्त 
टिक टिक से परे, धडकन से इतर
एक लम्हा बुनना चाहता था

लम्हों को बाँध के रखने की इस जद्दोजेहद में 
उम्र भी कतरा कतरा पिघल गई 

फिर तुम भी तो साथ छोड़ गयीं थी ... 

शेख जायद रोड - दुबई की एक मशहूर सड़क
बुर्ज खलीफा - अभी तक की दुनिया में सबसे ऊंची इमारत दुबई की

मंगलवार, 19 मई 2015

ईगो ...

ज़िंदगी क्या इतनी है के दूजे की पहल का इंतज़ार करते रहो ... और वो भी कब तक ... प्रेम नहीं, ऐसा तो नहीं ... यादों से मिटा दिया, ऐसा भी नहीं ... तो फिर क्यों खड़ी हो जाती है कोई दीवार, बाँट देती है जो दुनिया को आधा-आधा ...

दो पीठ के बीच का फांसला
मुड़ने के बाद ही पता चल पाता है

हालांकि इंच भर की दूरी
उम्र जितनी नहीं
पर सदियाँ गुज़र जाती हैं तय करने में

"ईगो" और "स्पोंड़ेलाइटिस"
कभी कभी एक से लगते हैं दोनों
दर्द होता है मुड़ने पे
पर मुश्किल नहीं होती

जरूरी है तो बस एक ईमानदार कोशिश
दोनों तरफ से
एक ही समय, एक ही ज़मीन पर

हाँ ... एक और बात
बहुत ज़रूरी है मुड़ने की इच्छा का होना      

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

समय ...

समय की ताकत को पहचानने वाले पल, बस कुछ ही आते हैं जीवन में ... आज की तारीख के बारे में सोचता हूँ तो कुछ ऐसा ही महसूस होता है ... बीतते बीतते आज माँ से बिछड़े दो साल हो ही गए ... हालांकि उस दीवार पर आज भी उनकी फोटो नहीं लगा पाया ... स्वर्गीय, श्रधांजलि जैसे शब्द उनके लिए इस्तेमाल करने से पहले घबराहट होने लगती है ... ये जरूर है की सोचते सोचते कई बार संवाद जरूर करने लगता हूँ माँ के साथ विशेष कर जब जब उसका तर्क समय की ताकत को पहचानने के लिए होता है ...


मुझे पाता है
तुम कहीं नहीं जाओगी

हालांकि जो कुछ भी तुम्हारे बस में था
उससे कहीं ज्यादा कर चुकी हो हम सब के लिए

सच मायने में जो हमारा फ़र्ज़ था
तुम तो वो भी कर चुकी हो
बिना बताए, बिना जतलाए

तुमसे बेहतर कौन जानता था हमारी क्षमता को

इसी विश्वास के बल पे कह रहा हूँ
तुम रहोगी आस पास हमेशा हमेशा के लिए

वैसे भी माँ को बच्चों से दूर
कौन रख सका है भला ... 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

समय ...

एक ही झटके में सिखा दीं वो तमाम बातें 
समय ने 
सीख नहीं सका, बालों में सफेदी आने के बावजूद 
उस पर मज़े की बात      
न कोई अध्यापक, न किताब, न रटने का सिलसिला 
जब तक समझ पाता, छप गया पूरा पाठ दिमाग में 
जिंदगी भर न भूलने के लिए   

सोचता था पा लूँगा हर वो चीज़ समय से लड़ के 
जो लेना चाहता हूं 
समय के आगे कभी नतमस्तक नहीं हुआ 
हालांकि तू हमेशा कहती रही समय की कद्र करने की ... 

सच तो ये है की सपने में भी नहीं सोच सका 
रह पाऊंगा तेरे बगेर एक भी दिन    
पर सिखा दिया समय ने, न सिर्फ जीना, बल्कि जीते भी रहना 
तेरे चले जाने के बाद भी इस दुनिया में 

तू अक्सर कहा करती थी वक़्त की मार का इलाज 
हकीम लुकमान के पास भी नहीं ...    
समय की करनी के आगे सर झुकाना पड़ता है ... 

सही कहती थी माँ 
समय के एक ही वार ने हर बात सिखा दी