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गुरुवार, 14 मई 2015

किस्सा रोज का ...

संवेदना ... कुछ वर्षों में ये शब्द, शायद शब्दकोष में ढूंढना पड़े ... वैसे तो आज भी मुश्किल से दिखाई देता है ... पर क्यों ... क्या हम कबूतर हैं? आँखें मूंदे रहेंगे और बिल्ली नहीं देखेगी ... दूसरों के साथ होता है ये सब, हमारे साथ तो कभी हो ही नहीं सकता ... और अगर हो गया तो ... क्या हमारा इतिहास भी ऐसा ही होने वाला है ...

भरा पूरा दिन
सरकारी हस्पताल से एक किलोमीटर दूर
मौत से जूझती चंद सांसें
जीवन की जद्दोजहद
भीड़ से आती फुसफुसाहट

"हे भगवान ... कितना खून बह रहा है"
"अरे भाई कोई पुलिस को बुलाओ"
"अरे किसी ने कार का नंबर नोट किया क्या"
"हाय कितना तड़प रहा है बेचारा"
"लोग अंधों की तरह गाड़ी चलाते हैं"
"जरा देखो सांस चल रही है की नहीं"
"क्या जमाना आ गया भाई"
"चलो भाई चलो क्या मजमा लगा रक्खा है"
"अरे ऑटो रिक्शा जरा साइड हो"
बिना बात ही ट्रेफिक जाम कर दिया
वैसे ही आज ऑफिस की देर हो गई

अगले दस मिनटों में भीड़ छटने लगी
तड़पता जिस्म भी ठंडा हो गया
सड़क से गुजरने वाली गाड़ियां
बच बच के निकलने लगीं
शाम होते होते म्यूनिस्पेल्टी वाले
लाश उठा ले गए

रोज़ की तरह चलती रफ़्तार
वैसे हो चलती रही जैसे कुछ हुआ ही नहीं