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सोमवार, 29 जून 2015

बुन्दा

हर पुराने को समेट के रखना क्या ठीक है ... फिर उन्ही पुरानी चीज़ों को बार बार देखना, फिर से सहेजना, क्या ये ठीक है ... क्या चीज़ों का, यादों का कूड़ा दर्द के अलावा कुछ देता है ... सहेजने के बाद क्या निकाल फैंकना आसान है इन्हें ... शायद हाँ, शायद ना ...

मुश्किल होता है
पुरानी दराज़ साफ़ करना
बेतरतीब बिखरी यादों के अनगिनत सफे
कुछ को फाड़ देना
कुछ को सीधे कचरे में ठेल देना
और कुछ को ...
अपनी ही नज़र बचा के सहेज लेना

यादें फैंकना
जिस्म से कई हजार साँसें नौच लेने के बराबर होता है
हालांकि उम्र फिर भी ख़त्म होने का नाम नहीं लेती

याद है अमावस की वो काली रात
मेरे सीने से लग के रोते रोते
तुम्हारे कान का बुन्दा अटक गया था मेरी कमीज़ के साथ
उस दिन नज़र बचा के जेब में रख लिया था मैंने उसे

तुम तो अपना बोझ हल्का करके चली गयीं
पर ये बुन्दा फांस की तरह अटका रहा सीने में
संभलते संभलते इक उम्र छिज गई थी जिंदगी से

इस बार सफों को समेटने की कोशिश में
वो बुन्दा भी छिटक आया दराज़ के किसी कोने से

कितनी अजीब बात है न ...
अब जब सांस कुछ थमने लगी थी
फांस की तरह अटकी यादें भी बह चुकी थीं
आज फिर ...
नज़र बचा कर ये बुन्दा सहेजने का मन करता है  

सोमवार, 17 नवंबर 2014

धूप छाँव उम्र निकलती रही ...

बूँद बूँद बर्फ पिघलती रही
ज़िंदगी अलाव सी जलती रही

चूड़ियों को मान के जंजीर वो
खुद को झूठे ख्वाब से छलती रही

है तेरी निगाह का ऐसा असर
पल दो पल ये साँस संभलती रही

मौसमों के खेल तो चलते रहे
धूप छाँव उम्र निकलती रही

गम कभी ख़ुशी भी मिली राह में
कायनात शक्ल बदलती रही

रौशनी ही छीन के बस ले गए
आस फिर भी आँख में पलती रही